पौ फाटी रो उजास
भौर रै सुपना नै चंचेड़ै,
बींरी गोदी में बैठो सूरज टाबर चिड़कल्यां रै मूंढ़ै बोलै
सुख भर नींद पौढ़णियां!
अंधारै री खतावणी छोड’र आगै आवौ
अर थांरा नुंवा खाता खोल’र
दिन री बही में दो आंक बधावौ।
जूनी बहियां रा पिण्ड सरावण सूं–
यादां रा गुटका पीवण स्यूं–
ऊगतै सूरज रै घोड़ां री रासां कियां थमसी?
सिंझ्या रै बिखरयोड़ै सिन्दूर सूं
भोर रो मुट्ठी भर उजास किंया मिलसी?
सूरज री अणदेखी करियां
तावड़ै री जाजम नीं साटीजै!
गरुड़-पुराड़ बांचणियां स्यूं
जलम रा नारेळ नीं बांटीजै,
नुंवी पीढ़ी रै होठां माथै टांकिज्योड़ा आखर नुंवा अरथ चितेरै।
पीढ़ीयां रै आंतरै स्यूं भासा री खंख झाड़ै
अर बीनै गैरी दिस्टी री रगड़ स्यूं चिलकावै।
कदास बुस बुसिजियोड़ा आखर मूंडो खोल नै कीं बोलै
तो जुगां रै गूंगै दरद री
कीं पिछाण तो हुवै?
पोली धरती माथै नाठियोड़ा गीतां रा नीसाण तो हुवै।
बखत री व्याकरण रा अरथ बदळग्या।
जूना पड़ियौड़ा सर्वनाम, विशेषण, क्रिया थाक’र सूयग्या।
मानखै री चालख आंख नै गैरा अरथ सूझै,
आभै रै आंतरै सूं गैरो गोतो लगावै।
बखत रै पाणी में तिरतो इतिहास
गोताखोर ज्यूं चिब्बी लगाय’र मांयली बात काढ़ लावै।
अर बींनै बैंवतै पाणी में गळाय’र आपरा गाभा पैराय देवै।
पण मसाणां रो पाड़ोसी– अध गावळो बखत,
हालतांई नुंवी जिन्दगी रा पगलिया मांडणा चावै।
अर बूढ़ी अंगरख्यां, झगला-टोपी में समाणी चावै।
बानै कै द्यो–
थांरै टांकी-टोकणा री घड़ाई पूरी हुई
अबै बखत रै टांचा क्यूं लगावो?
थड़ी करतो चेतणा नै पगलिया लेवण द्यो।
गेलै बैंवतै बदळाव रै हुड़ी क्यूं लगावो?
थांरी बांचीजियोड़ी पौथी नै उथळता रैवो
नुवां आखरां री पींड़ी क्यूं पकड़ो?
जींवत सराध करणा व्है तो करज्यो।
बना-घोड़ी रा गीत अब कठै?
रळी रा गुटका पियां बा सागी मिठास कठै?
चेतणा में पीढ़्यां रो आंतरो है,
अबै इनै कुण पाटै?
सुरग बिसाई लेवण वाळो बोपारी
जिन्दगी रा नुंवा थान किंया सांट?
बिखरतै मेळै माथै क्यूं फिंगरावो?
बखत री अेक ठोकर खाय’र
आ बोदी चौपाल ढै जासी।
बोखी कहाण्या अर ढळता किस्सा रैह जासी।