1.

गरजता गिगन विकट रागां अरड़ाट करै
लाखां नभ गंगा लपलप लाल जीभी
नौबतां गूंजै छन्दां रूधिराळां
नाच अे नाच काळी चामूंडा कंकाळी।
थोरो क्रोधाळ नाच, हे मातेसरी
जाचूं मैं, द्रवूं जिण, बणूं घण रगत रंग।

2.

पांचूं तत्व सिस्टी रा कोपै अर गरजै
संघारक सिस्टी रा भूखां सब मारै
टूक-टूक बुद्धि रा करै घोर महारव
नाचै अणथाक अर ऊछाळै अगन झळ
थारो अणथाक निरत, हे मातेसरी
जाचूं मैं, द्रवूं जिण, बणूं घण रगत रंग।

3.

सवेगा आंतरा धूजै अर लड़खड़ै
पीढ्यां राजवंसां री पड़ै, अवसाण हुवै
डाको डगां पीड़क पगां घूमै सरबनास
भौ भीतां संसारां नाचं सरबनास
थारो क्रोधाळ नाच, हे मातेसरी
जाचूं मैं, द्रवूं जिण, बणूं घण रगत रंग।

4.

कोप परचंड ग्रहमंडळां बिधूंसती
ढोल सरबनास रो घणरव घुरावती
विकराळां नैणां झलां ऊपाड़ती
जुगां अर कळपां रा भसम कर अणत काळ
थारो क्रोधाळ नाच, हे मातेसरी
जाचूं मैं, द्रवूं जिण, बणूं घण रगत रंग।

5.

धूंस हुयी सिस्टी, खण्ड खण्ड भी अणंत काळ
मद ज्योत सिब धर्‌या ताक निर्वाण री
थारै उन्मत कोप प्राजळती अगन में
उछळै अर लिपटै तूं उण सूं जो संग्याहीण
थारो क्रोधाळ नाच, हे मातेसरी
जाचूं मैं, द्रवूं जिण, बणूं घण रगत रंग।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : सुब्रह्मण्य भारती ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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