आसण री रिछपाळ
अतरी सैज कोनी
चावै राजनीत व्है
कै धरम व्है
क्यूं कै आज तांई
अेक ही राजा जनक
जलम्यौ हो
जिण राज अर जोग नै
सफळता रै साथै
पाळ्यौ।
आजकाल तो
हरेक
उतावळौ है
मंजिल पावण नै
कद मिल जावै
मोवणी सत्ता
फेरूं आम सूं खास बण'नै
राजा इन्दर रो सुख
भोगणौ है।
वायदा तो
पगौथिया चढ़णै रो
साधन व्है
ऊँचै म्हैल में पूगणै सारू
जतरा सोवणा आस्वासन
वतरी ही मोह निद्रा
जनता नैं तो
औ नी तो वौ
सगळा ही लूटै।
ओ अजब खेल है
जठै कुटिल मिनखां रो मेळ है
चौपड़ री इण बिसात में
धरमराज व्है चावै कोई ओरूं
मामा सकुनि सूं तो
हारणो ही है
द्रोपदी दाव माथै
लागणी ही है।
हे पाण्डवां!
इण सड़यंत्र सूं
अबै तो चेतो
अर अै झूंठा पासा
परा फेंको।