हरदां की धरा पै

उश्यों

न्हं होवै

कविता की फूटैड़

सुख की फसल

कै लेखै

उपाड़णी पड़ै छै

अपणै-हाथां

अबखाया का छाड़।

जदी तो महके छै

जिन्दगाणी को बगीचो

कविता को

सबद-सबद पष्प-पष्प।

ज्यां सबनै

दिखाणी पड़ै छै

धसूळ्यां को

सावचेत

पहरो होता सता बी

अपणी-अपणी सौरम की मरजाद।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ओम नागर ‘अश्क’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
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