कीं कोनी हो

म्हारै कनै

म्हारो तो,

जमारो इसो, कै

चाटूं तो खारो लागै

उखणू तो भारां मरूं

लाय इसी, कै

ढाणी रा सगळा टापरा बळग्या

मिनखां रा हेत सूखग्या

दिया इसा, कै

दियां हेठै अंधारो

रोसनी रो आंगणो

कंदी ज्योड़ौ अळसेड़ो

कीं कोनी हो

म्हारै कनै

म्हारो तो,

आकासां सामी निरख्यौ

पेलां सूं बफरग्यौ

कै मिनख री सोनै री आंगळ

सूं इज हालै

जमीन कानी आस बांधी

कै हेलियां अर इमरतां रा

टोळ चालै

अळी-गळी आप-आप रो अळोवणो

महंगाई रौ महाकाळ

कीं कोनी हो

म्हारै कनै

म्हारो तो,

ललाट माथै हाथ फेरण

रो अेक आंगळ है

ललाट माथै अलेखां अळूझण

ईज अेक आंगळ

थांरै कानी इसारो करतां

म्हारौ होग्यो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : नरपतसिंह सोढ़ा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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