एक दिन भायलां की एक टोळी

मैंनै दारू प्यादी बौळी।

लड़तो-लड़‌खड़ातो मैं घरां आयौ

घरआळी को देखतां माथो चकरायौ।

बोली— ''सुबै सै क्यूंई कोनी खायो है

बेरो नी कठै सूं गोड़ो पी कै आयो है?''

मैं सोची, इंगलिश दारू नै गोड़ो बतावै है

तो घी के भाव आवै है।

थोड़ी देर पछै एक चक्कर आयौ

बीं कै सागै ही पड़ग्यौ रात को खायौ पीयो।

दारू में मिल्योड़ा चावळ चूस्सो खा रैयो हो

बड़ी मस्ती सूं मधुरस पा रैयो हो!

थोड़ी देर पछै म्है देख्यौ—

बो ही चूस्सो बिल कै आगै-पीछै चक्कर लगार्‌यो हो

फेर भी बीं नै अपणो स्थाई घर कोनीं पा रैयो हो।

चावळ एक चीड़ी भी खा री ही।

पछै चीड़ी कै दारू आळा चावळां को असर आयौ

तो बीं नै बीं रात अपणो आलणो कोनी पायो।

सुबै चीड़ी आलणै पूगी तो चीड़ो बोल्यौ—

''सगळी रात कठै मरै ही, मैं तन्नै अब एक मिण्ट भी कोनी राखूं।

तेरे जिस्सी सुर्‌पणखा मैं देखूं हूं लाखूं।''

चीड़ी रोई, गिड़‌गिड़ाई

दारू मिले चावळां सूं नशो हुयौ बताई।

पण चिड़ै तो बीं नै आलणै सूं काढदी अर भोत सताई।

बीं ही गळी सूं मैं घूमणनै जा रैयो हो

रात का उळझ्या विचार मन ही मन सुळझा रैयो हो।

चीड़ी को गिड़‌गिड़ाणो अर चीड़ै की बातां मेरे असर करगी

मेरै कारण बां री गृहस्थी टूटती देख'र मेरी आँख्यां भरगी।

मैं सोची, मेरै एक दिन के नशै भी आपकी दिखादी चाल

रोज पीवंणियां को के होतो होसी हाल?'

मैं भाग्यौ-भाग्यौ घरां गयो,

घरां पड़ी दारू की बोतलां जमीन पर मार'र फोड़ दी

बी दिन सूं मैं दारू पीणी छोड़ दी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : निरंजन सिंह निर्मल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 22
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