एक महानगर रै बिचाळै गम ग्यो

म्हारो गाम,

उणनै घणो तलास्यो

पण ढूंढतै टेम सगळी गळ्यां

सड़कां-चोराया’र चे’रा

एक बरगा होग्या।

नगर री सड़कां धुधंळी-अळसाई-सी होगी

सांस री अवाज होळै पड़ण लाग री है

अर निजरां रो पाणी बाढ़ री तियारी करै है

बेरो नीं बीं पासै

ईं पासै...सगळै पासै

एक बरगो मातमी आलम फैल्यो है,

के म्हारो गाम दब ग्यो अब सड़कां री काळी डामर नीचै

का-मिनी स्कर्ट

जींस पैंटा मांय गम ग्यो

चमच मांवता चे’रां मांय बी तलास्यो

पण—चे’रां पर तो चे’रा चढ्योड़ा हा

बठै क्यूंकर लाधतो?

मनै जबरदस्ती खेंचता रैया बै सड़क रा दरड़ा

ईंयां लागै जींयां

बां मांय दब ज्याऊंलो

पण—

बै तो पैलां सूं भर्‌या पड़्या

मरेड़ा सपनां सूं।

होळै-होळे गाम री कीं निसान्यां याद करूं

जींयां होळै-होळै सन्नाटो बुणूं

किती भींता

कुण कठै हो

किती शंकाळू छोरियां सोधूं पण

बै जाणै किस्यै खूणै मांय गमगी?

फेफड़ा सूं निकळी सांसां री अवाज मांय

घुळती धुंधली सी आवाजां म्हनै आकर्षित करै

पण बै तो बेजान ही

सुणतो कींयां?

आथण होवण लागगी,

म्हारी आंख्यां रो पाणी के ठा क्यूं सूख ग्यो?

अर के ठा क्यूं सामणै री सगळी चीजां

धुंधली सी दिखण लागगी?

अर—

म्हे भीज्यै स्वर मांय कैवां—

म्हे असफल रैया क्यूं’कै सो कीं एक सो व्है ग्यो,

अर गाम कोनी लाद्यो,

ओज्यूं सोच्यो तो सोच रो स्तर जाणै क्यूं नाजुक व्है ग्यो?

अब म्हूं और नीं सोच सकूं,

म्हारे जै'न मांय मचळता सवाल

बढतै कुटेव अर सोर मांय दब ग्या

अर एक पूरी पीढ़ी गमगी गाम री

म्हारा युवा उडग्या

सिगरेट सूं निकळतै धूंए रै छल्लां मांय

पण गाम..?

गाम गम ग्यो

महानगर री चकाचौंध मांय।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सतीश छिम्पा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 26
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