नारी!
नित तू जलम-दुखारी
थन्नै पाळै
बाळपणै सूं ई
भेद-भाव कर
इण धरती पर
वाह-वाह नर
पुरस-प्रधान व्यवस्था थारी!
अेक आंगणै बैनड़-भाई
खावण-पीवण दूध-मळाई
बणी मानसिकता
क्यूं अैड़ी?
भेद-भाव सूं बांटै माई
अेक उदर में ही जलम्योड़ा
बेटै नै भळै क्यूं इधकाई?
मात-पिता रो
पालण-पोखण
लाड़-प्यार सागै दुलरावण
बेटी लारै
बेटो जायो
हेमाणी काईं सागै लायो
सैंग कडूंबै रै मन भायो
पळ-छिण उणनै
इधको चावै
बेटी नै पण
क्यूं बिसरावै?
धीवड़ क्यूं
जलमी बेचारी
इण धरती पर?
छोटो-मोटो
काम-काज सै
घर रो स्सौ
खोदेड़ो सारो
भरै हाजरी
सैंग जणा री
हुकम उठावै
टाबरपण सूं ई
घर रै मांहीं
धीव सदा ई
राजकुंवर पण
है लाडेसर
घर रै मांहीं
बो है शिशु-नर
नान्हो-मोटो
काम करै बो
घर रो कींकर
उण नै कोई
कद काईं कैवै
बैठो बो भी
हुकम चलावै
बाई माथै।
शिशु-नारी पण
काढ्यां जावै बेगारां बा
टाबरपण सूं ई
भाई री भी।
मायड़ रै संग
घर रै सांभै
फूस काढणो
चौको-बरतण
गाभा-लत्ता
छोटा-लत्ता
सैंग जणा रा
नितरा ई धोवण
काईं करै पण
करणो ई पड़सी
जलमत ही
बण गई बेचारी
बा शिशु-नारी
टाबरपण सूं
पळै बापड़ी
बेदर्दी सूं
नर री तुलना
पैंड-पैंड पर
पड़ी उपेक्षा
पावै भारी
पढण-लिखण
खेलण-कूदण में
खावण-पीवण
पहरण-ओढण
बेटै सारू
बणै योजना
घर परबारू
पण बेटी नै
निजर कैद कर
राखै माईत
जाणै कींकर
निजरां सूं छिण
छेड़ै व्हेतां
केई बात
सोचै महतारी
किती ताळ सूं
कठै गई बा?
कठै रमी
किण रै घर जीमी
हिवड़ै सोच
करै घण भारी
बेटो पण
अलमस्त फिरो जग
साईणां संग
मौज मनावो
देश छोड
परदेसां जावो
सैंग छूट है
बो टाबर-नर
उणनै के डर
इण धरती पर?
नारी माथै
बन्धण भारी
थकां माईतां
बा—बेचारी!
मन मार्यां
मुरझाई बेलड़
टाबर-नारी
अरमानां री
बळै होळक्या
सहन करै स्सौ
घात निरन्तर
नर री तुलना
टाबर-नारी
इण धरती पर!