अंधड़ मरोड़'र फेंक दीनौ है

पुराणै घर रौ छप्पर

आगौ

घणौ आगौ।

म्हनै ललचावण आळी

उण जागा में

अबै कोई रैवण नीं आवैला।l

क्यूं नीं हरैक कमरै में

मौसम नै बरसण दां

कांई आभै नै छत री गळाई

ओढ्यौ नीं जा सकै?

वौ घणौ सैज व्हैला

सपाट अर हरमेस सारूं।

भारी माथै नै

बिरखा री छांटां सूं भिजोवणौ

किणी लांबी पारटी सूं

घणौ भारी नीं व्है।

दिवटियां री जगै

चांद रै उजास री कल्पना करी जावै अर

चमकतै सूरज नै आवण देवां।

बंतळ री जगा हळकी बरफ पड़ी व्है,

किताबघर धूंअर सूं छाईजियोड़ौ व्है अर

बिसतरां माथै व्है पत्तियां-पानड़ा।

कोई फूठरी कल्पना करतां

बाथ-टब में पड़िया

आपां, बादळां नै ऊपर सूं निकळ जावणदां।

जीमण सारूं त्यार व्हैता थकां

किणी भी अचाणचक सारूं त्यार रैवां

अर नीं विचारां—

वौ कितरौ है,

कांई है?

अर रात में, उठै

अपणै हिंवड़ै में सितारां री

गति रै बिचाळै

आपां की नीं गमावांलां

सिवाय अपणै अैकलपै रै।

स्रोत
  • पोथी : रसूल अमजातोव अर विदेसी कवितावां ,
  • सिरजक : डेविड वैगनर ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
जुड़्योड़ा विसै