चौरावै बीच ऊभो
मैं देख रैयो हूं,
लोगां रो जमघट है।
कुण लारै ऊभो
कुणसो गिर पड़्यो
कुण देखै, कुणसो थमै
किणी कनै वखत नीं
सगळा बधता जाय रैया है
पण साथी!
थमण रो ई
गरब है न्यारो।
धोरां री ढळातां ऊपर
पून्यूं री रसधार सूं
सिनान, निरदुंद
आगूंच हूं, आभै कानी।
दूर मंजळां सारू
भाजतोड़ी कार रा
साथ्यां!
आवो, इकलाण रो
आणंद लेवो
इणरो ई गरब है न्यारो
परभात री सुख-वेळा
मलै-पून रो अणपम बहाव
अपणापो बिसार नै
मैं निदाळूं हूं
सुख वाळा सुपनां मांय मगन
म्हारा साथी!
मनै अजेस मत जगाणो!
इण नींदड़ली रो ई
गरब है न्यारो।