दूक दूक कै क्यूं थारी

पत खोयी

आखिर होयी तो बा

जो होणी थी

अती बहसबाजी

करकै के मिल्यो

अरे! कोई पै तो

जी टेक्यो राख्यो होतो

जिका नै थे थारा

आप आळा समझो

बै ही थारी लुटिया

कोनी डुबोवै

की के गारंटी है?

अति सी बात तो

ध्यान में राखल्यो

सुख पावोगा।

बेमतलब की स्याणपत करणां में

क्यूं ही आणा-जाणी कोनी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल अग्रवाल ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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