अेक
न्हाय-धोय’र बिरखा रै पाणी में
करै है नखराळौ सिणगार
मिजाजी धरती।
रूप री रंभा
सजै है बूटेदार हरी छींट रै घाघरै
अर बसन्ती चोळी में
मिठास भरदे चिड़कल्यां री बोली में
मधरै-मधरै बायरियै में
झूम-झूम जावै
अचपळी लै’रां रै सागै लैरावै
रंग-बिरंगै फूलां री सेज माथै
रसियै आभै नै रिझावै।
कदैई खितिज रै खोळै में बैठ’र
लटूंब जावै उण सूं गळबाथां घाल’र
कदैई चांदणी पियोड़ी
सूय जावै निसंग आधी उघाड़ी
टांग्या पसार
आ तो बता—
थूं कांई नुंवी बीनणी है म्हारी धरती?
दो
भूरै-भूरै पहाड़ां रै सारै
पीळी सरसूं रा रूपाळा खेत
तीन
घेर घुमेर गाछ
गीरबो कर सकै है
सोवणै सरूप माथै
बायरै में झूमती सौरम माथै
डाळ्यां माथै लटूंबतै रसीलै फळां माथै
पण वै ओ करै कोनी।
वै जाणै है कै
रस व्है चावै सौरम
आव व्है चावै ऊंचाई
सगळा हेठै सूं आवै है
जड़्यां रै पाण ई
फळ रसीजै है, पत्तियां झूमै है
पंछीड़ा गावै है
फुनगी आभै सूं बंतळ करै
तो जड़्यां रै पाण
पंछीड़ा परवाज भरै तो जड़्या रै तांण।
रूंख माटी री मरजाद नै पिछाणै
जड़्यां री ताकत नै पताणै
धरती रै धीजै नै जाणै
थूं कांई लोकतंत्र है म्हारी धरती?