कविता अर गीत वांनै समरपित

नारी रै वास्तै ओसयाळी खुद धरती

भलै आदूनारी हव्वा पापण ही

पण वाइज जामण है मिनखाजूण री

जो जगत बाग रौ है माळी

धरती नारी रूप धरै

अर सगळी चिन्तावां सहै

मिनखजात नै टाबर समझ

हरमेस वांनै आगै बधावै

सियाळै अर ऊनाळै में रातदिन

ओट, छियां नै अन्न देवै

गोदी बिठाय करै पोसण

अर कांधै ऊंचाय दिखावै आभौ

मिनख इण उपकार नै मानै

भागफाटै नित जागतौ

मैणत रौ फळ सज पावै

नित जळमभोम रौ रूप संवारै

धरती माथै घणेरा दुस्ट है

जे अैड़ा हेत सूं रूसियोड़ा है

जगत री छिब नै बिगाड़ दै

रूंख री डाळ भांगे फूल फंफेड़ दै

दुस्ट वावै धरती पर बीज विखवाद रा

पण मैणत रै हरख नै बधावण सारू

धरती वांनै खतम कर दै

अर फेरू भायां आपां सुख पावां

धरती में सिरजण री सगती है

अचांणचक पुनरजीवण ज्यूं

बात फालतू नीं कै मरण री टेम

म्हां जलमभौम नै हिवड़ै सूं याद करां

कवि समरपित करै गीत

नारी, बैन, मां अर घरआळी नै

क्यूंकि नारी अर धरती नित ही

हरख अर मैणत री जामण है।

स्रोत
  • पोथी : रसूल अमजातोव अर विदेसी कवितावां ,
  • सिरजक : मुलदागालीयेव ,
  • प्रकाशक : रॉयल पब्लिकेशन, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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