सुगन संझ्या सांगाणी खळै, मालाड़ी मुळकाय।
मगरै-मगरै मोवणा, मोरूड़ा मालाय॥
मरूधरा री सिरमोर, खेजड़ियां खिळकाय।
बोरड़ियां बिच्च बैठी, चिड़िया चरचराय॥
चपाचप काकर चुगती, बाटेड़ियां बिडदाय।
ताळ-तळाइयां बैठी, कुंझड़ियां कुरळाय॥
पगाँ पसवाड़ै परडां, पडी'ज पळोटा खाय।
काबर कागां कोकिला, वळ खट रस बरसाय॥
वहिया करै वाह-वाह तेली लटपटाय।
काचा कैर कुंभटिया, मन मीठा मुळकाय॥
भूत-भतूळिया ऊभा, काळी कार कढाय।
सूरज सगत ज्यूं साखी, चांद घणो चमकाय॥
खेतां-खेतां भल भणत, करसा ही कैवाय।
गोरड़ी गऊआं हेत, धीणौ धज धधकाय॥
कुंवर कर किलकारियां, उठ-उठ सामा आय।
कोट कीरत कोटड़ियां, जन गल्लांह गड़काय॥
वाहला तीरथ बोले, जामण जोत जगाय।
मरूधरा रो गुण गाता, हिंयो हबोळा खाय॥
तीज तिवारां री तान, जबर गीत गूंजाय।
मेळां-खेळां री खिळक, इंदर देखण आय॥