गांव री नीरांत अर

सहैर री चकाचौंध रै बिचै अटक्योड़ा पग—

म्हैं गतागम में पज्योड़ी

कठीनै जाऊं।

गांवां में बरस दर बरस

तूटतौ,

कम पड़तौ पाणी,

कुवां री जातिगत पिछांण,

पण अजै तांई कायम है।

स्हैरां में ठौड़-ठौड़ लाग्योड़ी

लांबी लैणां सूं घायल

म्हैं गतागम में हूं।

गांवां री गळियां

म्हारौ नांव जांणै,

म्हारी अर म्हारी मां री आंख्यां री

पिछांण जांणै,

पण रेत ज्यूं सिरकता,

अळगा व्हैता, रुजगार सारू

टाबरियां नै स्हेरां में भेजण सूं

म्हैं गतागम में हूं।

गांवां में बोलण री छूट है,

पण सुणण री छूट

कदास कम हुवण सूं

म्हैं गतागम में हूं।

गांवां रौ वगत सूरज सागै चालै,

स्हैरां रौ घड़ी सूं

गांवां में रातां लांबी व्हैण सूं

नीरांत नींद सोवां

स्हैरां री नींद

किस्तां में आवण सूं

म्हैं गतागम में हूं।

गांवां री माटी पूछै—

‘पाछा कद आवौला?’

स्हैरां में

मकान रौ भाड़ौ पूछै—

‘खाली कद करौला?’

इण बात सूं

म्हैं गतागम में हूं।

गांवां री बोली में मां जिसी

अपणायत,

अर स्हैरां में

अंग्रेजी मीडियम री खारी जैर

आफत सूं

म्हैं गतागम में हूं।

इणी गतागम में

म्हारी भासा अर म्हारा सवाल

दोनूं मरता जावै।

स्रोत
  • पोथी : सुवालड़ी (राजस्थानी कविता संग्रै) ,
  • सिरजक : प्रमिला शंकर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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