म्हनै थारी फकर थारा राम की,

म्हनै फकर फकत म्हारा ईं काम की।

या दुनिया ज्यों अरथ में गळगोच्या खा री,

म्हूं कांनै फकर करूं अेक-अेक छदाम की।

जीणूं पड़ र्‌यो है जीसूं जीर्‌‌यो हूं।

जाण जूनी दगली नै जोड़-तोड़ सीर्‌‌यो हूं।

जीवा रै वास्तै सभी नै पीणूं पड़ै।

पीणूं पड़ र्‌यो है जीसूं पीर्‌‌यो हूं।

घरसण सूं आग पड़ै है,

घरसण सूं राग छिड़ै है।

जे घरसण नै लादली-पलाणली,

वांका अकल्पित भाग भिड़ै है।

पागड़ी सूं पगरखी को मोल जादा है,

केर्‌यां सूं मूंगा मलर्‌‌या कांदा है।

खानदानी आदमी नैं कठैई जगां कोयनै।

(पण) तुर्रा कलंगी लगा फरर्‌‌या बांदा है।

जिन्दगी पाणी रो रेलो या हाथ्यां रो भचेड़ो है,

जिन्दगी ढाणी रो धड़ेलो या बाण्या रो बखेड़ो है।

या कड़ी तूंबी ज्यूं तारै या तर जावै।

कांई कैवै मखमली रजाई, पण रेजारो पछेड़ो है।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : भंवरलाल पांडेय ‘प्रमोद’ ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जून, अंक 04
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