म्हे गीतां का बिणजारा

गळियां-गळियां हाट बजारां

बांटां रतन उधारा, म्हे गीतां का बिणजारा।

सुरसत मा का सरवण स्याणा

भीतर बाहर उजळा बाणा।

सोया भाईड़ा जागै तो

जठै कठै रोपै कमठाणा।

सुरसाधक सुरग्यान सुरीला

समरथ सिरजन हारा।

म्हे गीतां का बिणजारा।

मिनख जळम साधै पण पाळै

घर-घर भर-भर बाळद ढाळै।

मीं अंधियारी रात जगावैं।

पैल्यां पर घर बार संभाळै।

पाबूपीर पबाड़ो गावैं सबद रतन भण्डारा।

म्हे गीतां का बिणजारा।

जद बसन्त रंग रळियां आवै

हरियल बागां कोयल गावै।

फागण आंगण पी परदेसां

डागळियां धण काग उडावै।

ढफ बाजै’र धमाळ सुणावै गींदड़ घूम नगारां।

अै गीतां का बिणजारा।

नो रस गावै नी रस खावै।

तापै ग्रीषम नर तन तावै।

जाण बिजोगण धण ही हेतां।

बिरखा रुत बादळ बण ज्यावै।

उझळै हीव हिलोरां धोरां घर-घर तीज सिंधारा।

अै गीतां का बिणजारा।

देश धरम साहित्य तपस्वी वाग्धणी मन मगन मन मनस्वी

तुंग हिमाळै सा ऊंचा अै धीर समन्द अगाध मनस्वी

अति उद्धत उत्ताळ तरंगित शीतल सुरसरि धारा।

अति उद्धत उत्ताल तरंगित शीतल सुरसरि धारा

अै गीतां का बिणजारा।

दुसमण जै झांकै सींवाळै

सरवण स्याणा कलम संभाळै

बीर बांकुरा खड़्या हिमाळै

छाती ताण्या सींव रुखाळै

हर-हर महादेव जै गूंजै गीत बणै अंगारा।

म्हे गीतां का बिणजारा।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल मिश्र ‘सुमन’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 14
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