बेजां ई सोहणी है।
रूप और लावण्य तो
बेमाता कूट-कूट कर ही भर दीन्हो
हे सांवरिया के काम को अयां को रूप
गुणा कै नाते धूळ का दाणा भी कोनी
जिको ले ज्यासी बीं की तो फूट ज्यासी।
रुप नै चाटैगो के?
बयां ही तीजूरियां भरी पड़ी है
दौलत की तो जाणै बाढ आ री है
पण के काम को अयां को धन
जिको कदै काम में ही ना आ सकै
सुभाव तो बळज्याणो अयां को है
जाणै गर्म-गर्म तवा पै पाणी का
छांटा मार दिया हो।
पढाई-लिखाई घणी करी
कठै भी कोई चीज कोनी छोड़ी
पण के काम की जद सुभाव में
कठै भी सांच कोनी
विनम्रता कोनी
आपणोपण कोनी—
तय थानै करणो है!