सरनाटौ भरियोड़ी रिंदरोही,
चारूं मेर सूनवाड़,
‘बस’ काली नदी माथै तिरै,
दोनूं कानी,
सोनलिया रेत।
आपरी धुन में मस्त हुयोड़ो,
अेक गांव रो रैण वाळो,
गावै लोक गीत।
ढाण्यां रै कोरै परेम नै,
कैवै अेक जणौ धीमै-धीमै।
अचाचूक रो फाटै बम्ब,
सिकली सिकली हुय जावै बस,
चिथड़ा बिखर जावै जीवण रा।
दबियोड़ौ रोळौ,
कागलौ नानै टाबर रो कंवळो हाथ—
ले जावै चूंच मांय घाल’र।
मारै चीलख झपटां,
मिनख रै मांस रै लौथड़ां माथै,
कुण जाणै ओ लोथड़ो,
किण जामण जायै रो है।
गिरज भी मंडरावै—गोठ रै वास्तै,
जिका जातरी बचग्या,
फंसग्या
चिरलावै पाणी-पाणी।
दुखी मनड़ै सूं करै है घायल जातरी मदद।
सूरज बिंसाई जै,
उण री लांबी छावावां,
टाबर नै की मालम,
खावै धूड़ सूं भरियोड़ी डबल रोटी।
जाणै मिरत्यु रै मेळै मांय,
जगावै अलख जीणै री।
फेरुं जोवै इचरज मर्योड़ी दीठ सूं,
कट्योड़ा अंगां नै।
सायत सोचै,
अे कैड़ा रमतिया है।
जिण सूं टपकै टोपो-टोपो रगत।
तद ई गुर्रानै लागी जीपां,
सायता कूदण फांदण लागी,
करूणां रा वाक्य टकरावै,
तूटोड़ा चंग, अलगोजो, ढोलक-नगाड़ा।
इकतारो अर रावण हत्थो,
मर्योड़ै गावणवाळां रै वास्तै,
गावै मरसियो।
टाबर मर्योडी लुगाई कानी जोयनै,
कैवै मां…मां…मां…।
फेरुं जोवै आभै कानी,
आभै मांय पीळो मांदो चांद,
लज्जा सूं लुक जावै,
बादळा मांय।
अचाचूक रो फाटै बम्ब।