घर आळै खेत मांय

उभी बोरड़ी रै

भाटा मारतां थकां

म्हैं नीं सोच्यो हो कदैई

कै उछळ’र अेक भाटो जा लाग सी

ईश्वर री पीठ माथै

बेरीया ले’र घरै आंवती बखत

मांऊ थान कानी देख’र बोली

कीत्ता भाटा आया है थान माथै

पाप लाग सी,

रात नै दुख्यो हो पेट,

म्हैं मांऊ नै पूछयो

पाप उतरग्यो?

मांऊ गोदी में ले’र केयो

टाबरां नै कोनी लागै पाप,

पण माऊं गळत ही,

मांऊ नीं सोच्यो कै टाबर,

मोट्यार होसी

थान माथै फैंक्या भाटा ही

लगोलग उग आया है

म्हारै अर थारै बिचाळै…

म्हैं कविता मांडणी तो जाणू हूं

पर नीं जाणू भाटा-भाटा जोड़’र

थारै ताईं आवण रो राह बणाणो।

स्रोत
  • पोथी : कवि रै हाथां चुणियोड़ी
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