अंध आस बिसवास री, कुरीतियां री छांव।

कुंडली मार्‌यां सांप सो, बैठ्यो म्हारो गांव॥

बैठ पिलंग पर बात नै, रोज करै उपदेस।

लग्यो कमावण सहर में, सेडू रो सरवेस॥

पतड़ो लेकर गांव रा, रोज पढ़ै दिन-मान।

खुद रा दिन ना बावड़ै, जोसी जी हैरान॥

भेड़ चराणू छोड़कर, रोज चबावै पान।

जद स्यूं मियां हुसैन रो, पुत्र गयो ईरान॥

सड़क बणी ना नल लग्या, गया बोट बेकाम।

फिर चुणाव में गांव नै, माया मिली राम॥

वादा करै विकास रा, निडर संभाळ्यां मंच।

जीत गयो फिर गांव में, गिरधारी सरपंच॥

बांट रह्यो है सीरणी, पीर बली रै द्वार।

पंच बण गयो गांव में, फिर मोहम्मद मणियार॥

कैंची, कंघा, कांख में, करै कटिंग रो काम।

गप्प हांकतो गांव में, हरीराम हज्जाम॥

गांठै कदे दोस्ती, नगदी लेवै दाम।

दारू में पाणी मिला, बेचे गोबिन्दराम॥

घर में चोरी व्है जणा, कोई व्है बेमार।

बूजा काडै गांव में, किसनाराम कुम्हार॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कुन्दनसिंह सजल ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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