(1)
बगत है खांडै री चमचमाती धार
बगत है समदर रौ फुफकारतौ ज्वार
न बंध्यौ है न बंधेला बगत किणी सूं
बगत है वेगवंत पवन रो संचार।
(2)
बगत है काळियौ नाग, विष अपार
स्याणां अर समझ्यां कनै नीं है उपचार
जो इणनै नाथणौ, खुद कृष्ण बण जा
काळ रै जळ सूं काया नै खंगाळ।
(3)
बगत है चौफेर पसर्योड़ौ थार
बगत है तिरसाया कंठ री पुकार
बगत नै समझणौ सोरौ नीं बावळा
बगत है एक पण रूप है हजार।
(4)
बगत है फूल किंयां शूल रौ सिणगार
बगत है जिनगाणी पे मौत से भार
बगत पे बगत नै समझ्यौ जिण सांतरो
बगत है लगायो बेड़ो उण री ई पार।
(5)
बगत है राम अर रावण भी बगत है
बगत है लंका अर अयोध्या बगत है
बगत री गांठा सुळझेला बगत सर
मिनख रौ काम तो सुळझाणौ फगत है।
(6)
बगत ही गीता, बगत वेद रो पारायण
बगत है महाभारत, बगत ही रामायण
बगत रौ छंद जुदा, भाषा पण न्यारी है
बगत है नर अर, बगत ही नारायण।