कींनै फुरसत! कुण करै बात

मिनखां री दबगी मर्द जात।

दिन ढळ जावै क्यूं आवै रात?

राता रळियो फेरूं प्रभात।

तूं-में, मैं-ओ, ओ-बो

जो जो कठै गयो बो।

लदग्यो, भारी बदग्यो

लिचपिच टांगा अर पड़ै लात।

चरलै, भरलै, झरलै,

कुण सी होवै परलै?

मीठो बणकै, तणकै

दो होठ हिला, कर सरू बात।

तेरो-मेरो चै’रो

भेद बड़ो गै’रो।

थोथी लप-लप जप-तप

भगवान रीझ भी करै घात।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : धनंजय वर्मा ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जून, अंक 04
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