एक कळी

डाळ पे खिली

फूल बण

म्हारी अंजली पे उतर’र

म्हने मिली

छंटगी मन री धुंध

महकगी मीठी गंध

मन

सावचेत भी न्ह हो पायो

अणाचूक ही

काळ बायरो आयो

बिखरगी

फूल री पांखड़ी-पांखड़ी

जीवण रो बस

अतरो’ज अरथ समझ में आयो

इच्छावां री कोरी धरती पे

उण री गंध

खाद बण

माटी में रळगी

आगली फसल रे वास्ते

तो म्हें भी

बीज बण बिखरूं

कली बण निखरूं

फूल बण सौरम

जगत में बांट दूं

बिसूकती मिनखात में

प्रीत री गंध

कळी खिले

फूल बणे

कुम्हलावे

पछे, बिखराव

बस, ही तो है

काळ रा तीव ठांव

स्रोत
  • पोथी : दरद डूँगरा : दरद समँदरा ,
  • सिरजक : नन्दकिशोर चतुर्वेदी ,
  • प्रकाशक : ज्ञान प्रकाशन मंदिर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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