म्हारै-थारै

घर रै बिचाळै भीतां

किण बात री भायां?

एक खून रा जायोड़ा

एक धरती रो अन्न खायो?

थारी-म्हारी मायड़ धरती

रोटी सेकै न्यारी किंयां?

घणां टाबर कमाई थोड़ी

किंयां भेजां पढ़बा तांईं

रोट्यां मांगै कपड़ौ मांगै

घर मांय नीं मावै।

भायां रा टापरा बंटग्या

मायड़ स्यूं टाबर फंटग्या

टाबरां री राड़

बणगी ऊंडी खाई

मांयड़ रै मन मांय मनहूसी छाई।

सिर फिर्‌योड़ा धरती माथै

लड़बा तांईं सींव बणाई

भाई रा खूनी बणग्या भाई।

देस प्रांत भासा रो झगड़ौ

परवाण चढ़ग्यो, यो टंटौ बडौ भारी

जात पांत रो भेद मिटै किंयां भाई?

घणां टाबर, दुख घणो

बात सगळा कैवै

घणां मिनखां स्यूं

मायड़-धरती री दूखै काया।

इणनै फांटबा तांई—

मिनख मारै, झगड़ो करावै

पण फांट नीं सकै मिनखां री परछाई

मा स्यूं हेत करा

मायड़-धरती री काया बदळां

टाबर थोड़ा होवै, चेतौ राखां भाई।

जात-धरम नै भूलां

मल्हम लगायां मिनखां रै घावां नै

हिंयै मांय दीयो जला’र

हेत स्यूं एक-बीजै नै गळै लगावां भौम नै आपणो घर बणावां।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रतन ‘राहगीर’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
जुड़्योड़ा विसै