सीळी पून रै समचै
उडिया
थारा बाल,
म्हारा होस!
किण
अदीठ आस सूं
बांध लियौ
म्हारौ मन रूपी घोड़ो
थिर ऊभी थूं।
मार लियौ तीर।
कितरा ई
क्यूं नीं रचीजौ
चक्रव्यूह
थारै-म्हारै बीच
अडिग ऊभो है
अढाई आखरां रौ अभिमन्यु
बड़ जावैला
बगतसर बिचाळै
च्यार आंख्या नैं चीर।