सीळी पून रै समचै

उडिया

थारा बाल,

म्हारा होस!

किण

अदीठ आस सूं

बांध लियौ

म्हारौ मन रूपी घोड़ो

थिर ऊभी थूं।

मार लियौ तीर।

कितरा

क्यूं नीं रचीजौ

चक्रव्यूह

थारै-म्हारै बीच

अडिग ऊभो है

अढाई आखरां रौ अभिमन्यु

बड़ जावैला

बगतसर बिचाळै

च्यार आंख्या नैं चीर।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो पत्रिका ,
  • सिरजक : शंकरसिंह राजपुरोहित ,
  • संपादक : नागराज शर्मा
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