आपरी ‘हां’ सारै

म्हैं इण संसार नै मार दियौ

कुळ, लाज-सरम, डर-भौ—

सगळौ विसार दियौ।

सगळौ आपौ मेट दियौ म्हैं म्हारौ...

म्हारा सायब!

थे ‘ना’ मती दीजौ

आपरी ‘हां’ लारै म्हारौ संसार है

‘ना’ कैवतां मसाण।

म्हनै ओळख मत दीजौ

म्हनै ‘ना’ मत दीजौ

बेमौत म्हनै मत मारजौ

उठै अधबेई रा समदर अपार है

आपरी ‘हां’ लारै

म्हारौ संसार है।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : श्रीमती सरोज कछवाह ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जनवरी 1987
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