दूर तक पसर्योड़ी धरती
घणी आसा सूं
आभै नै हेलो देवै—
‘आ आपां मिल नै
अेक होय जावां’
पण
आभो जाणै आ बात
कै, बींरो’र
धरती रो कदै'ई
मेल नी हो सकै
चावै तो आभो भी
घणोई है कै
बो धरती सूं मिल’र
अेक होय जावै
पण
बो जाणै है
आपरी मजबूरी
अर
जिण बेळा
आभै री मजबूरी
घणी बध जावै
घणकरो बरस’र
बो दैवै
अर
करले आपरै
हिवड़े नै हळको।
धरती भी उण बगत
समझण लाग जावै
आभै री मजबूरी
अर
आभै रे बरसण सूं
नम हुय’र
घणकरी हरियाळी
फैला’र
जतावण लाग जावै
आभै रो आभार।