अेक भांबण वेजौ बणता आपरा धणी नै कह्यौ— देखौ गूदड़िया रा भायजी, पूरी दोय घड़ी खोटी व्हूं तद कठैई जायनै छाछ री अेक हांडी हाथ लागै। दस ओडी थेपड़ियां थापतां-थापतां तौ म्हारौ सगळौ डील बंध जावै। सगळा चौक में फूस-वायदौ काढ़णौ पड़ै, कदैई-कदैई चौक नै गारा सूं नीपणौ पड़ै, नित ठांण बुहारणा पड़ै। रोट्यां नै कित्तौ अबेळौ व्है जावै। कणा खेत में भातौ लै जावूं अर कणा सीधौ करूं? इण रोजीना री बेगार सूं तौ म्हैं काई व्हैगी। बिना छाछ लायां सरै कोनीं। लगावण बिना रोटियां कीकर खावां? राबड़ी करलां, खाटी-घाट करलां, ऊनी-छा करलां, छाछ में मिरचां रळाय सोगरा चूरलां। म्हारौ कैणौ मांनौ तौ अेक भैंस अपारै मोल लेलौ। भैंस रा खरचा जित्तौ तौ घी बेच देवांला। म्हैं कांकड़ सूं रोजीना भारौ लेय आवूंला। थांनै कदै फोड़ा नीं घालूं। सगळा टाबर आरांम सूं रैवैला। थांनै घर रौ घी, दूध, दही हाथ आवैला तौ पाछा करारा होय जावौला। काच में थांरौ मूंडौ तौ जोवौ, आंख्यां में सांस आयौ थकौ। म्हारा सूं तौ देखणी नीं आवै।

भांबी घरवाळी री बातां रौ हूंकारौ भरतौ गियौ अर वेजौ बणतौ रह्यौ। भांबण हाथ पकड़नै बोली— थें सावळ विचार करनै म्हनै पक्कौ जबाब दौ। अेकर भैंस मोलायनै तूमार तौ जोवौ। पछै कदै बिना धीणै-धापै रैय जावौ तौ म्हनै कैजौ।

बात तौ भांबी रै पूरी हीयै ढूकगी, पण भैंस वास्तै नांणौ कठा सूं आवै? बात तौ मोटी रिपियां री ही। वौ कह्यौ— बावळी, म्हैं थारी बात कद टाळी! जकौ थूं म्हनै घड़ी-घड़ी खरावै। भैंस तौ लेलां पण नकद-नारायण कठा सूं लावां?

भांबण कह्यौ— म्हारी कड़ियां, वाळलौ, टोटियां अर बिछिया अडांणै धरदां। आधी-दूधी रकम भेळी व्है जावै तौ आधी-दूधी री उधार राखलां। गांव में हाल तौ थारै नांव री घणी पैठ है।

भांबी भैंस लेवण सारू सोळै आंना मांनग्यौ। कह्यौ— भैंस लेवणी है तौ पछै पाडी वाळी भूरी झोट लेवांला। भांबण रै उतावळ अंत इज घणी ही। गांव में ईं उणरौ पीवर हौ। बोली— जावूं म्हारी मां नै खुसखबरी सुणाय दूं।

भांबी कह्यौ— भली आदमण, थोड़ौ नेहचौ तौ राख। इत्ती खतावळ क्यूं करै? थांमें इज तौ मोटी खोड़ है।

भांबण फट मांनगी। पण आगै कह्यौ—कालै कूंभार रै अठा सूं अेक मोटी गोवणी, चार पारियां, दोय लांठी परातां अर अेक छोटी कुलड़ी जरूर लावजौ।

भांबी पूछ्यौ— बाकी सगळा ठांव चाहीजता है, पण छोटी कुलड़ी किण वास्तै, म्हनै ठाह नीं पड़ी?

भांबण खुसी में मुळकती बोली— थांनै क्यूं ठाह पड़ै? मां तौ म्हारी है। थारै कांईं गनौ? म्हैं अठै दूध दही में मछरां करूं अर म्हारी मां दुख पावै, म्हनै अैड़ी भैंस नीं मोलावणी। अेक कुलड़ी में न्यारौ दही जमायनै मां रै वास्तै मैलस्यूं। अबै तौ थांनै सावळ ठाह पड़ी।

भांबी नै कैवण सूं ठाह तौ पड़गी, पण उणनै बात सुहाई कोनीं। वौ जई देवतां बोल्यौ— कोई जरूरत नीं। मां रै दही-फही भेजण री। म्हारै परबारी कीं चीज भेजदी तौ थूं थारी जांणै। पछै म्हारै जैड़ौ कोई भूंडौ नीं है। रांड, अबारूं ईं देवाळै भेळण रा सराजांम करै।

भांबण रै इत्तौ खटाव कठै। वा मटका करती बोली— अेक बार नीं, सौ बार भेजस्यूं। थें बरजणिया कुण व्हौ? कांईं म्हारौ घर में इत्तौ सारौ-बारौ कोनीं? छतै धीणै, म्हारी मां दूध-दही वास्तै कळपै! म्हारा सूं तौ देखणी नीं आवै। सगळौ नीरणौ, चारणौ अर दुवारी तौ म्हैं करस्यूं अर म्हारै सारै कोनीं! थें करणौ व्है जकौ कर लेज्यौ, म्हैं तौ चौड़ै धाड़ै सैंठी कुलड़ी भरनै दही पुगावूंला।

भांबी जिद पकड़ली। छीजतौ बोल्यौ— थूं सीधा कैणा सूं मांनजा जेमती, नीं तौ म्हैं अबारूं थारी भारणी काढ़ देवूंला, पछै म्हनै भूंड मत दीजै।

अबै लारै सिरकण वाळी भांबण कठै? सवायौ आंमनौ जतावती बोली— थांरौ जोर व्है जकौ कर लेजौ, किणरी मां अजमौ खायौ जकौ म्हारै चड़ापौ वाय सकै। म्हैं तौ रोजीना दोनूं वगत ढुळढुळती कुलड़ी दही री भरनै पुगावूंला। म्हारी मां नै दही री भावड़ अणहूंती है।

अबै भांबी फालतू सवाल-जबाब तौ फिटा करिया, अर कांबड़ी हाथ में लेयनै भांबण नै सुरड़णी चालू करी, सड़ाक सड़ाक। भांबण जोर सूं कूकी— मारै रे, मारै रे।

भांबी तौ भूंडी सोची नीं कोई भली सड़िंद-सड़िंद भांबण रा मोर पींजतौ गियौ। बोल्यौ— मां रै वळै दही री कुलड़ी पुगाजै?

भांबण मार खावती कह्यौ— पुगावूंला, पुगावूंला।

भांबी तौ मारतौ ढबियौ नीं। पण भांबण रै भाग रा अेक बारहठजी गेलै जावता जोर सूं बोबाड़ा सुणिया तौ दौड़नै भांबी है झूंपै आया। कांईं खिलकौ देखै के भांबी तौ भांबण नै रूई पींजै ज्यूं पींजतौ हौ। भांबण बोबाड़ा करती ही—मारै रे, मारै रे?

बारहठजी भांबी रौ हाथ झालियौ अर फटकारतां कह्यौ—भला आदमी यूं तौ जिनावर नै नीं मारै। थनै आज कांईं हिड़कियौ सूझियौ!

भांबी कह्यौ— म्हैं इत्ती बरजी तौ जेमती कैवै के आपरी मां रै दही री कुलड़ी भरनै पुगावस्यूं! इणरा लक्खण अैड़ा है। गाडी रौ पाचरौ अर लुगाई रौ टाचरौ तौ कूट्योड़ौ कांम देवै।

बारहठजी रै आंणा सूं कूटतौ ढबियौ तौ भांबण कह्यौ— पुगावूंला, सौ बार पुगावूंला। थें बरजण वाळा कुण व्हौ? अपां दही-दूध में मछरां करां अर म्हारी मां दही वास्तै तरसै, म्हारा सूं देखणी नीं आवै!

भांबी लपकनै चार-पांच कांबड़ियां फेर सुरड़ी। बारहठजी आडा आयनै समझावता कैवण लागा— भला आदमियां, कीं बात तौ बतावौ। कैड़ी कुलड़ी, किसौ दही अर किणनै पुगावणौ, म्हनै समझावौ तौ खरी।

भांबण रोवती-रोवती भैंस लेवण री सगळी बात बारहठजी नै मांडनै बताईं। सारी बात सुणनै अेकर तौ बारहठजी नै जोर सूं हंसी छूटी, पण उणी सांयत रीस में आंख्यां काढ़ता भांबी नै ओळबौ दियौ— कमसल, थारी भैंस नै सावळ खूंटै बांधियोड़ी को राखै नीं। वा म्हारा खेत में जांणै जित्तौ उजाड़ कर दियौ। मूंडौ मगदूर बापड़ा रौ के म्हारै थकां कोई म्हारौ खेत भेळाय दै।

भांबी रा हाथ सूं कांबड़ी खोसनै आवेस चार-पांच सड़िंदा मैलिया, कह्यौ— फेर म्हारा खेत में बिगाड़ करावैला? खाल नीं उधेड़ न्हाकूं!

भांबी अरड़ावतां कह्यौ— हाल तौ भैंस आई कोनीं, पछै आपरा खेत में कीकर बिगाड़ व्हियौ? म्हनै इण बात रौ म्यांनौ बतावौ।

बारहठजी उणनै फटकारता कैवण लागा— भैंस तौ मोलाई कोनीं, उण पैला थारी कैवूं जकी रौ मार-मारनै पोखाळौ कर दियौ! कठै भैंस, कठै कुलड़ी अर कठै दही! बातां-बातां में ईं बापड़ी रा मोर पींज न्हाकिया।

अबै जायनै भांबी नै चेतौ व्हियौ के बापड़ी री हकनाक भारणी उतारी। बारहठजी रै समझायां पछै वौ खासौ पिछतायौ।

स्रोत
  • पोथी : बातां री फुलवाड़ी (भाग-1) ,
  • सिरजक : विजयदान देथा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार प्रकाशक एवं वितरक
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