मायड़ भाषा जन जन री मूळ अस्मिता हुवै

 

यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ राजस्थानी अर हिंदी रा चावा लिखारा। हिंदी में आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी। राजस्थानी में ‘हूं गोरी किण पीव री’, ‘जोग-संजोग’, ‘चांदा सेठाणी’ उपन्यास अर ‘ताश रौ घर’ नाटक छप्या थका। चन्द्रजी नै केई पुरस्कार मिळिया ज्यूं ‘फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार’, ‘मीरां पुरस्कार’, विष्णुहरि डालमिया पुरस्कार अर राजस्थान साहित्य अकादमी अर राजस्थानी अकादमी सूं चन्द्रजी सम्मान पाया थका। आप बीकानेर रा बासिंदा है अर बीकानेर ई बिराजै।

 

राधाकिशन चांदवाणी :  चन्द्रजी, आप सरूपोत में साहित्य री किसी विधा माथै लिखणौ सरू कियौ?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : पैलपोत म्हैं कवितावां लिखणी सरू की। आ बात सन् 49-50 री है, अर म्हारी कवितावां में बीं जुग री चोखी पत्र-पत्रिकावां में छपी, जियां ‘चांद’, ‘प्रवाह’, ‘मजदूर जगत’ अर ‘नवयुग’ उण दिनां री प्रमुख पत्रिकावां ही। बीं वखत म्हैं राजस्थानी भाषा रै मांयनै कई कवितावां लिखी अर वै सुणायां लोगां नै चोखी लागी। बीं जमानै री बात है के अेकर इलाहबाद में म्हैं, अमृतराय, डॉ. महादेव साह अर नागार्जुन आपस में बतळावण कर रैया हा। म्हैं राजस्थानी री बात दूजी प्रांतीय भाषावां रै बरोबर राखी तो अमृतराय आ मैणौ दियो के प्रेमचन्द री कहाणी ‘कफन’ रौ उल्थौ सगली भाषा में है पण थांरी राजस्थानी में कोनीं। म्हैं उठै सूं आय नै बीं रौ उल्थौ कियौ जकौ जोधपुर सूं प्रकासित होवण आळै ‘ज्वाला’ में ‘खांपण’ रै नांव सूं चार अंकां में छपियौ। म्हैं अठै राजस्थानी में लिखणै री बात इज आपनै बता रैयौ हूं। कलकत्ता रै चार बरसां रै प्रवास में म्हैं राजस्थानी में ‘खींवजी आभलदे’, ‘केसरिया पगड़ी’ अर ‘नागजी साभळदै’ तीन नाटक लिख्या जिका धूमधाकै सूं ‘मून लाईट’ अर ‘कोरेन्थियन’ पारसी थियेटर में खेल्या गया। उण नाटकां रा निदेशक माणकलाल डांगी अर मास्टर फिदा हुसैन हा। इण रै पछै म्हारौ लेखण कहाणी अर उपन्यास तांई सीमित हुयग्यौ अर स्वतन्त्र लेखण होणै रै वजै सूं म्हारौ झुकाव हिन्दी कानी हुयग्यौ अर म्हैं बीं में रच-बसग्यौ। हिन्दी रै लगातार लेखण सूं थे लोग परिचित हौ इज।

 

राधाकिशन चांदवाणी :  चन्द्रजी, आप हिन्दी रै लेखण कानी झुकाव री बात कैयी, ईं रौ कोई खास कारण?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : आ तौ चांदवाणी जी, थे खुद जाणौ हौ के राजस्थानी में जद शोध पत्रिकावां तो घणी सारी ही, पण आधुनिक साहित्य नै बीं री गरिमा रै सागै राखण वाळी पत्रिकावां आंगळियां माथै गिणीजण जिती इज ही। अर इती थोड़ी होतां थकां ई बीच-बीच रै मांय बन्द हो’र निकळती ही। जिकै सूं कोई भी सार्थक लेखण चोखी तरियां सामै नीं आयी। कोई भी लिखारौ आप रै सिरजण नै छपणै अर पाठकां ताईं पूगण री मनसा तो राखै ई है। जद अै साधण नीं होवै, तद लिखारां में अेक कटाव-सो आ जावै। म्हैं थांनै आज भी दो टूक कैवणौ चावूं के जिण तरियां राजस्थानी में लेखण होय रह्यौ है बीं तरियां बीं रौ प्रकासण, प्रचार ने प्रसार नीं होय रह्यौ है। जे होवतौ तो कोई भी लिखारौ आपरी मायड़भाषा नै छोड़’र दूजी कानी नीं नाठतौ।

 

राधाकिशन चांदवाणी : अबार रै राजस्थानी साहित्य अर भाषा रै संबंध में आपरा कांई विचार है?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : चांदवाणीजी, राजस्थानी अेक न्यारी भाषा तो है ई, अर बैं री प्रकृति अर पिछाण भी न्यारी है। अर जिण ढंग सूं बीं में लिखारा लिखै, इण सूं लागै के थोड़ौ सो सावचेत होयनै सिरजण कियौ जावै अर लिखारा छोटा-छोटा पूर्वाग्रहां नै छोड़ नांखै, तो भाषा री अेकरुपता बेगी बण जासी, नीं तो थोड़ौ वखत लागसी। भाषा री समस्या लिखारां री समस्या तो कदैई गम्भीर समस्या होवै कोनीं। पण पूरै प्रांत में जिकौ बोली रौ प्रभाव है उठै थोड़ी सीक आ समस्या बणै। जियां ‘बाबा सा री लाडली’ जोधपुर में धमाकं रै सागै चाली अर बीकानेर में कम चाली। ‘लाज राखौ राणी सती’ अर ‘म्हारी प्यारी चनणा’ बीकानेर में सागीड़ी चाली अर दूजी ठौड़ फेल हुयगी। चांदवाणी जी, थे आ जाणौ ई हौ के फिलम आम आदमी सूं जुड़्योड़ी रैवै। इण सूं आ बात चोखी तरियां स्पष्ट हुय जावै के उण रौ कारण भाषा इज है। अेक बात हूं अेकदम साफ कैवणौ चावूं के आपां रै बिचाळै जद तांईं अेक अैड़ी भाषा नी जनम लेसी जिकी राजस्थान रै अेक खूंणै सूं दूजै खूंणै तांईं संवाद री स्थिति पैदा नीं करै, तद तांई भाषा रौ साहित्यिक स्वरूप बणनै में दोरप ई पड़सी।

 

राधाकिशन चांदवाणी : तो चन्द्रजी, भाषारी अेकरुपता खातर आप रा कांईं विचार है?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : म्हारा विचार सूं, सैसूं पैलां तो सरूपोत री शिक्षा मायड़ भाषा में इज देवणी चाइजै। वजै सामै है, के टाबर स्कूल जावणै सूं पैलां आपरी मायड़ भाषा रा लगैटगै अेक हजार शब्द तो सीख ई लेवै। अर जद बो भणवानै जावै तो बीं नै भणायौ जावै ‘राम अेक अच्छा लड़का है।’ तो बीं नै ‘लड़का’ अर ‘अच्छा’ रौ मतलब समझावणौ पड़ै। जद बीं नै ओ भणायौ जावै ‘राम अेक चोखौ/सांतरौ टाबर/छोरौ है।’ तो बीं नै कीं समझावण री जरूरत कोनीं। दूजी, जिका भी सचेत लिखारा है वै सर्वनाम में कम सूं कम अेकरूपता राखै। जिण सूं विजयदान देथा री लोक कथा जयपुर रै किणी गांव में बैठै पढणियै नै समझ में आय जावै अर नृसिंह राजपुरोहित री कहाणी उदयपुर री खोड में बैठै रै गळै उतर जावै।

 

राधाकिशन चांदवाणी : अै सै काम नी होणै री वजै आप कांईं समझौ?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : आजादी सूं पैलां राजा-महाराजा साहित्य रै प्रति कीं विशेष ध्यान कोनीं दियौ। इसौ ध्यान जिकौ साहित्य री अेक अैड़ी धारा नै प्रवाहित राखतौ जिकै में ठहराव नीं होवतौ। कीं विशेष सिरजण रै अलावा वर्तमान परंपरावां कानी जोवण री इज चेष्टा नीं हुई, जैड़ी बंगला अर तमिळ-तेलुगु में हुयी। आजादी पछै अेक ई इसौ राजनेता कोनीं होयौ जिकै कै राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति अर संस्कृति रै बाबत सोच्यौ होवै। आपां कदैई आ नीं सोची के भाषा रै सागै-सागै राजस्थान री सगळी ओळखाण लोप होय जासी, अर मायड़ भाषा रै माध्यम सूं संवाद हीणता री स्थिति बण जासी। कदैई घणौ हो-हाकौ होयौ तो अकादमियां रौ टुकड़ौ आपां रै सामी नांख दियौ। आ बौत ई दुख री स्थिति है। हरीश भादाणी सही कह्यौ है के इण रै वास्तै जोरदार जन-आंदोलन होवणौ चाइजै। इण बाबत हूं आ कैवणौ चावूं के लिखारा तो आंदोलन करै ही, पण वां नै सही सफलता तो तद मिलसी जद वै सिंधियां री दाईं अेक समग्र वर्ग-संघर्ष नै छेड़सी। म्हारौ कैवणौ रौ मतलब औ है के व्यौपारी, कामगर, मजूर नै किरसाण सैंग रा सैंग इण आंदोलन में जुड़णा चाईजै। क्यूं के आपरी भाषा आपरै जण-जण री मूळ अस्मिता हुवै। म्हारौ कैणै  रौ मतलब हिन्दी रौ विरोध कोनीं, केवल म्हारी मायड़ भाषा रै अस्तित्व रौ सवाल है।

 

राधाकिशन चांदवाणी  :  आज जिकौ साहित्य लिख्यौ जाय रैयौ है, वीं रै संबंध में आपरा कांई विचार?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : घणौ ई सांतरौ अर स्तरीय सिरजण राजस्थानी में होवण लाग्यौ है। कवितावां में सत्यप्रकाश जोशी, रेवतदान चारण, नारायणसिंह भाटी, मेघराज ‘मुकुल’, गजानन वर्मा, उस्ताद, चन्द्रसिंहजी री परंपरा नै आगै बधाई हरीश भादाणी, तेजसिंह जोधा, नन्द भारद्वाज, चन्द्रप्रकाश देवळ, मोहम्मद सद्दीक, गिरधारीसिंह परिहार, कल्याणसिंह राजावत, श्यामसुन्दर श्रीपत, शिवराज छंगाणी, रघुराजसिंह हाड़ा, शक्तिदान कविया, भीम पांडिया आदि कवियां। अर गद्य लेखण में अन्नाराम सुदामा, नृसिंह राजपुरोहित, विजयदान देथा, डॉ. मनोहर शर्मा, जहूरखां मेहर, सूर्यशकर पारीक, प्राणेश, डॉ नागराज शर्मा, मुरलीधर व्यास, नानूराम संस्कर्ता सूं ले’र श्रीलाल नथमल जोशी, डॉ मनोहर प्रभाकर, सत्येन जोशी, बी. अेल. माली, रामेश्वर श्रीमाली, अर्जुनदान चारण, चेतन स्वामी, भंवरलाल सुथार ‘भ्रमर’, मालचन्द तिवाड़ी आदि। राजस्थानी नै नुंवै लेखण में दूजी भाषावां रै बरोबर राखण रा लूंठा जतन कर्‌या। इण कारण ई म्हैं जाणूं के अबार भी म्हांनै और आगै बधण री जरूरत है। देश अर विदेश रै साहित्य री तरियां म्हांनै ई आपरी भाषा रै लेखण नै पुगावणौ है। लेखण रै पेटै हूं अेक दूजी बात और कैवणी चावूं के केई अैड़ा लोग भी है जिका राजस्थानी रै नुंवै लेखण नै मोकळौ प्रोत्साहन देवै। उणां में हूं रावत सारस्वत रौ नांव देणौ चावूं। रावतजी नुंवै लिखारां री तो पीठ थपथपावै इज है, सागै वांरी पोथियां नै ई छापै, जिकौ घणौ महत्व रौ काम है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : ऊपरलै सवाल रै पेटै अकादमियां कांई जिम्मेदारी निभावै?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : चांदवाणी जी, जे अकादमियां आप रै दायित्व नै गैर-गम्भीरता सूं लेवै, तो लेखण रा घणा सीक सवाल इणांसूं जुड़ जावै। राजस्थानी री अकादमी न्यारी थरपीजणै रै पछै आपां जै बी रा सगळै कामां री जांच करां तो लागै के सगळा काम चाल रैया है। बौत थोड़ौ बजट, बीं में भाषा, साहित्य अर संस्कृति नै समेटणौ बौत दोरौ है। फेर लिखारां री समस्या सूं अणजाण जिका मिनख अकादमियां में आवै, वै पुरस्कारां, प्रकासण अर गोष्ठियां, सम्मेलण इयां करै, जाणै वांनै ओ काम इज करणा है। जद के होणौ ओ चाइजै के पूरी सूझबूझ सूं प्रोजेक्ट बणणा चाइजै, अर जिकां रौ काम अकादमी करै उणरी महता नै लोग स्वीकारै। सागै रै सागै प्रान्त री सगली भाषावां री अकादमियां में अेक ताळमेळ, अेक भाईचारौ अर प्रान्त री चोखी कृतियां नै छापण री अेक उदारता होणी चाइजै जिकै सूं प्रान्त रै लिखारां रौ साहित्य व्यापक बण सकै।

 

राधाकिशन चांदवाणी :  आज रा लिखारा रै सामी प्रकासण री जकी कठिनाई है, उण बाबत आपरा विचार?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र'  : राजस्थानी री पोथियां नै योजनाबद्ध तरीकै सूं छापणियां नीं तो प्रकासक है, अर नीं आपां री राजस्थानी अकादमियां। सैंग जाणै के लारलै दो बरसां सूं आपां री अकादमी कियां भूरसी बांटै! म्हनै तो आपां रै बीकानेर रै दीवाण भैरूसिंहजी री पद्धति याद आवै, के इयै ढिगळी वाळां नै छोड़ दौ अर इयै ढिगळी वाळां नै दे दौ। हजार-पांच सौ में आज रै वखत में कोई पोथी छपै? अर अकादमी री सहायता सूं इण ढंग री पोथियां छपै? म्हैं तो चावूं के इण पद्धति में तो अेकदम बदलाव आवणौ चाइजै। अकादमी योग्य लिखारां नै ‘फेलोशिप’ देवै अर पोथियां लिखावै अर छापै।

 

राधाकिशन चांदवाणी : अकादमी रै अध्यक्ष रौ पद बौत महत्वपूर्ण होवै, अर राजस्थानी अकादमी अेक महत्वपूर्ण अकादमी है। कांई इणरा अध्यक्ष आई. अे. अेस. आफिसर या राजनेता ई बणणा चाइजै?

 

राधाकिशन चांदवाणी : म्हारौ खुद रौ अनुभव थानै बताऊं चांदवाणीजी, राजस्थानी अकादमी रा लारला अध्यक्ष पूनमचन्दजी विश्नोई हा। उणां म्हां सदस्यां नै कैयौ के जे आपां नै छ: लाख रुपिया नीं मिळसी तो आपां काम करां कोनी। फेर जद जूनौ बजट ई मिळ्यौ तो म्हैं यांनै कैयौ के आपां नै इस्तीफौ दे देवणौ चाइजै पण विश्नोईजी में आ हिम्मत कोनीं आई अर अकादमी रिगचूं-रिगचूं करती चालती रैयी। अबै हूं ‘ब्यूरोकेसी’ माथै आऊं, जे बो आदमी साहित्य सूं जुड़ियोड़ौ है, आपरै प्रान्त रै लिखारां सूं उणरौ अपणापौ है, लेखण अर प्रकासण री तकलीफां सूं जाण पिछाण है तो कोई बात कोनीं, पण जे बो उमर भर खाली फाईलां इज देखी है, हुकम आदेस दिया है तो हूं आपनै साफ कैवणौ चावूं के उणसूं कोई लाभ होवै कोनीं। अेक छोटी सी बात है—थैं, अेक मिल मजूर नै संभळाय दौ, बो बीं नै चलासी, वजै के वीं नै उणसूं रोटी खाणी है। किणी सेठ नै संभळाय दौ, बो वीं नै चलासी, वजै के उणै आपरौ बंगलौ, मोटर अर ताम-झाम राखणौ है। पण अधिकारी नै कांई राखणौ है? उणनै तो महीनै रै महीनै तनख्वाह मिलसी, भलांई मिल चालौ या बन्द होवौ। इण वास्तै इण पद माथै आदमी तो साहित्य, संस्कृति अर भाषा नै जाणण वाळौ आवणौ चाइजै।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आप ‘फ्री लान्सिंग’ करौ, इण बाबत आपरा कोई खाटा-मीठा अनुभव?

 

यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' : ‘फ्री लान्सिंग’ रा खाटा-मीठा अनुभव तो घणा ई है, पण आज सूं 35-36 बरस पैली, अेक राजस्थानी लिखणियां नै दूजै प्रान्त वाळा कीं दीठ सूं देखता, आ हूं आपनै बतावणी चावूं। बात कलकत्ता री है, बीं वेळा भी म्हैं ‘फ्री लान्सर’ हौ। हूं अेक कहाणी लिख’र ‘चांदणी’ पत्रिका रै दफ्तर में गयौ। कहाणी बौत चोखी ही, गोष्ठी में बीं री घणी बड़ाई हुई। म्हैं संपादक नै वा कहाणी दीवी, संपादक म्हारै कानी जोयौ अर पूछ्यौ—‘कठै रा रैवण वाळा हौ?’ म्हैं पडूत्तर दियौ—‘बीकानेर रौ’। वै कैयौ—‘मारवाड़ी हौ?’ म्हैं कैयौ—‘हां’। वै म्हारी कहाणी म्हारै हाथ में दीवी अर कैयौ—‘जावौ, और कोई धंधौ करौ लिखणौ थांरै बस रौ कोनीं।’ म्हारै डील रै मांय झाळ-सी ऊपड़ी, पण बीं वेळा म्हारै मांयनै वा पौंच कोनीं ही। म्हैं बी बात री गांठ बांधली।

फेर अेक वखत इसौ आयौ के म्हारी कहाणी बिना ‘चांदनी’ पत्रिका निकळती कोनीं। छेवट अेक दफै म्हैं बीं नै अेक अधूरी कहाणी दीवी अर बीं नै छपवाय दी। फेर म्हैं आधी कहाणी वास्तै बीं संपादक नै चक्कर माथै चक्कर कढवाया। जद बो उफतग्यौ तद रीसां बळतौ बोल्यौ—‘थै कहाणी पूरी करौ कोनीं काई’ म्हैं बीं नै कैयौ—अरे हाँ, हूं बो ई सागी मारवाड़ी हूं, जिकै री कहाणी थैं वापस कर दीनी ही अर सैंग मारवाड़ियां नै अेक थप्पड़-सो मार्‌यौ हौ। हूं आ कहाणी पूरी करूं कोनीं। बोलचाल बधगी। लोहिया पुस्तक भण्डार में आ बात होय रैयी ही। कई लिखारा भेळा होयग्या, अर बां बात सुण’र संपादक माथै थू-थू करी। छेवट संपादक माफी मांगी। चांद वाणीजी, आ दोरप अर उपेक्षा म्हैं सही, पण म्हैं म्हारै नैचै अर विश्वास नै कोनी खोयौ।

 

आज रै राजस्थानी रै नुंवै लेखकां नै जाणै किती दोरप, किती उपेक्षा झलणी अर किती लांबी लड़ाई लड़ाई लड़णी पड़ैली, इणनै सोच’र ई सिरजण धरम नै निभावणौ है। छेवट म्हैं बडै अन्तरमन सूं ‘माणक’ रै प्रकाशक-संपादक श्री पदमजी मेहता अर श्री नृसिंह राजपुरोहित रौ आभार मानूंला के बीयां अेक अैड़ौ मासिक निकाळ्यौ जिकौ के नुंवौ रस्तौ बतायौ।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ सूं राधाकिशन चांदवाणी री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अगस्त 1987
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