रावत सारस्वत राजस्थांनी भासा रा नांमी विदवांन। लारला 30-40 बरसां सूं राजस्थांनी रा भांत-भांत रा कामां सूं जुड़िया थका। आप राजस्थांनी भासा साहित-संगम, बीकानेर रा सभापती रह्या अर राजस्थांन भासा प्रचार सभा, जैपर रा सचीव ई। सचीव पद माथै तौ इण वगत ई छै।
‘माणक’ री मारफत आप सूं कीं सवाल पूछीजिया। वां ईं सवालां रौ जबाब रावतजी रै मूंडै। इण वार ‘माणक’ रा पाठकां सारू खास।
तेजसिंघ जोधा : राजस्थांनी भासा रै विकास रा कामां री तरफ आपरौ ध्यांन कदै अर कीकर गयौ? अर इण सूं आपरा अणभव कांईं रैया।
रावत सारस्वत : बीज-रूप में कुछेक संस्कार म्हनै राजस्थांनी कांनी मोड़्या होसी, पण अठै मूळ बात रौ पड़ूतर देस्यूं।
अनूप संस्कत पुस्तकालय, बीकानेर में राजस्थांनी रा हथलिख्या ग्रंथां रौ सूची-पत्र त्यार करतां पुरांणै साहित री इसी छाप म्हारै मन माथै पड़ी, जिण सूं म्हनै रात-दिन राजस्थांनी रा ई सुपना आवण लाग्या। वां दिनां बीकानेर में स्वामीजी (नरोत्तमदास स्वामी) अेक हफतैवार गोष्ठी करता, जिण में राजस्थांनी गीत सुणावण रौ मौकौ तौ मिळतौ ई, साथै ई मुरलीधरजी अर श्रीचन्दरायजी इत्याद लोगां री रचनावां ईं सुणवा नै मिळती। अै 1927 सूं 44 तांईं री बातां। राज री चाकरी में, 1941 में म्हारी ऊमर 21 बरसां री ही।
वां ईं दिनां म्हैं चन्द्रसिंघजी री ‘बादळी’ रौ हिन्दी में पद्यानुवाद किरयौ, जिकौ उणरै पैलै संस्करण में 1942 रै आसै-पासै छप्यौ। ‘हंस’ मासिक में वां दिनां प्रेमचंदजी प्रादेसिक भासावां रा न्यारा संपादक बणा राख्या हा। स्वामीजी राजस्थांनी रा संपादक हा। राजस्थांनी रा विसयां माथै म्हारा लेख ‘हंस’, ‘सरस्वती’ अर ‘विसाल भारत’ में छप्या हा।
वां दिनां म्हारा गरू अर आज रै राजस्थांनी काव्य रा पैला कवि रांमनिवास हरित, कुंवर चंद्रसिंघ अर म्हैं, मिळ’र ‘प्राच्य कला निकेतन’ नांव री संस्था बणाई। राय बहादुर, रांमदेवजी चोखांणी ई उणरा सदस्य हा। उण संस्था सूं राजस्थांनी रौ कांम करण सारू म्हैं राज री नौकरी छोड़ दी अर साहित री सेवा में लागग्यौ। तजरबै री कमी सूं संस्था रौ कांम तौ कोनी चाल्यौ, सो कोनी ई चाल्यौ, म्हारै आगै रोजगार री अबखाई ऊभी व्हेगी। जैपर में 1945 में ‘प्राच्य-कला निकेतन’ नै रजिस्टर्ड करवाय’र दफतर तौ बणाय लियौ, पण पछै आजीविका सारू प्रेस रौ धंधौ सरू कर्यौ। उणमें जिंदगी रा दस बरस गाळ दिया। बीच-बीच में अेम. अे., कानून री पढ़ाई, वकालात, संपादकी, अैजेंटी, भूखमरी आद घणा पापड़ बेल्या। राजस्थांनी री टीस दबियोड़ी ई रैयी। फुटकर रचनावां कर-कर राखता रह्या, पण कोई ठोस कांम कोनी हुयौ। ‘वरदा’ नांव री त्रैमासिक पत्रिका रौ अेक अंक अर भरत व्यास री अेक पोथी बेसक छापी।
सन् 1953 में राजस्थांन बण्यां पछै कुंभारामजी आर्य सूं मिळणौ हुयौ अर वां री प्रेरणा सूं अेक संस्था ‘राजस्थांन भासा प्रचार सभा’ रजिस्टर्ड करवाई। चंद्रसिंघ जी इणमें ईं साथै हा। इण सूं ईं ‘मरुवांणी’ नांव रौ छापौ मासिक रूप सूं निकाळणौ सरू कर्यौ। पछै राजस्थांनी परीक्षावां, सम्मेलनां अर प्रकासणां रा कांम ई हुया।
तेजसिंघ जोधा : सुणियौ के किणीं जमांनै आप खुद राजस्थांनी में बकायदा कवितावां इत्याद लिखी? कुण-कुण सी विधावां में आप लिख्यौ, अर वौ लिखाई रौ कांम कीकर बंद हुयग्यौ?
रावत सारस्वत : कवितावां रौ सौक तौ हिंदी सूं सरू हुयौ। सन् 1937 सूं ईं। वां दिनां बिड़ला कॉलेज पत्रिका में अेकाध तुकबंदी छपी। कॉलेज (37-41) रा दिनां में बच्चन रा गीतां री तरज माथै हिंदी में गीत लिख्या। अेक गीतां री पोथी री भूमिका ई बच्चनजी लिखी। अेक पोथी मिळवां दो-तीन साथियां भेळी त्यार कीवी। अै दोनूं पोथ्यां छपी कोनी अर गमगी। पढाई रै दिनां ‘कुमार संभव’ रा कुछेक सरग पाठ्यक्रम में हा, वां रौ हिंदी अनुवाद कर्यौ। म्हनै याद है के कदै धुन में रात-रात भर छंद लिख्या करतौ, पण वै कांईं हा, अर कठै है, पतौ कोनी। जरूर कोई रौमेंटिक सैली रा होसी। म्हारी कवितावां उण बगत रै बीकानेर में सबसूं सिरै मांनीजती। आ राय डॉ. छगन मोहता केई वार सम्मेलनां में प्रगट कीवी। म्हनै याद है अेक वार हरीकिसन प्रेमी रै सनमांन में ‘गुण प्रकासक सज्जनालय’ में ‘अह्म’ नांव री लांबी कविता म्हैं सुणाई ही, तौ लोग म्हनै कांधा माथै उठाय लियौ।
राजस्थांनी गीत म्हैं 40-41 सूं सरू कर्या हा। वै जरूर सिणगार संबंधी होसी। म्हारै कनै अबै कीं ईं कोनी। 1944 में बीकानेर री नौकरी छोड़तां अेक काठ रौ संदूक कोई भलै ठिकांणै मेल्यौ हौ, सो 25 बरस बाद संभाळ्यौ तौ मिळ्यौ कोनी। सायद रद्दी में बिकग्यौ। राजस्थांनी में कदै ई सिलसिलैवार कोनी लिख्यौ। रिगवेद री रिचावां रा कीं अनुवाद वां दिनां कर्या, काळीदास रै मेघदूत रा कीं अंसां रा ई। पण बेसी ध्यांन पुरांणै साहित कांनी चल्यौ गयौ, मन में होता थकां ईं कविता रौ कांम ढीलौ रैगौ। बाद रा बरसां में सिणगार अर वीर रस री कवितावां, गीत आद लिख्या। ‘काळ’ पर अेक लांबी सारी कविता ई लिखी।
संगठन अर प्रचार-प्रसार रा कामां में बेसी मन लागणै सूं खुद लिखाई रौ कांम नहीं रै बरौबर होयौ। मरुवांणी में ईं कदै-कदास ई म्हारी चीज छापी। बाकी लोगां री ई छापी। पोथ्यां ईं दूजं री ई काढी। सुभाव सूं लाचार हौ। खुद नै प्रचार सूं दूर राख्यौ। सम्मेलन कर्या तौ ई मंच दूजां नै ई सूंप्यौ। 1960 रै अेड़ै-गेड़ै नाहटाजी री भोळावण सूं ‘डिंगळ गीत’, ‘महादेव पारवती री बेलि’, ‘चंदायन’, ‘दळपत विलास’ नांव री पोथ्यां जरूर संपादित करी, जिकी छपी। ‘मीणा इतिहास’ नांव सूं ईं अेक ग्रंथ छप्यौ।
तेजसिंघ जोधा : आप बरसां तांईं राजस्थांनी में ‘मरुवांणी’ जैड़ी खांतीली पत्रिका रौ संपादण करियौ, पण आं बरसां में लाग्यौ के पत्रिका रै संपादण रौ वैड़ौ उछाव आप में कोनी रैयौ, क्यूं?
रावत सारस्वत : ‘मरुवांणी’ म्हैं अेकलै ई काढी। पीसै-टकै री समस्याई म्हनै ई झेलणी पड़सी। कोई भांत रौ सहयोग कठै सूं ईं नीं मिल्यौ। कुंभारांमजी दो-तीन अंकां में तौ मदद करी, पण पछै वा ई कोनी मिळी। चंद्रसिंघजी बस पड़तां उत्साह बंधाता रहता।
संपादन रै कांम में जित्ता लोगां नै आजमाया वां सूं मन में संतोस कोनी होयौ। साहित री परख अर भासा रौ स्तर दोनूं बातां ईं म्हारै मन रै माफिक नीं ही। खुद रौ धंधौ दूजौ हौ, जिकै सूं जिसौ बगत निकाळ पातौ उण सूं ईं कांम चलाणौ पड़तौ। प्रेसां री दिक्कत सब सूं मोटी रैयी। प्रेस रै कारण ई अखबार बंद करणौ पड़्यौ। तिकड़म, उखाड़-पछाड़ म्हारै बस री बात कोनी ही। सो लाचार हुय’र अखबार बंद करणौ पड़्यौ।
जिसी-किसी सेवा लारला 25 नैड़ा बरसां में बण पड़ी, वा आपरै सांमै छै। वींयां ईं म्हैं महसूस करूं के संस्थावां अर अखबारां रा कांम खुद रै कैरियर रै खतरै पर करणा ठीक कोनी हा। इसा कांम करण सूं ईं साहित-सिरजण सूं अळगा पड़गा अर ‘गैर-साहितकार’ रौ फतवौ मिल्यौ।
जे साहित-रचना में रुची नीं होवती अर साहित रै प्रचार-प्रसार री हूंस नीं होवती तौ अठै किसौ धंधौ करणौ हौ। घर-फूंक तमासौ है औ तौ! म्हारी कोई तीस हजार नैड़ी पूंजी तौ हाल ई पोथ्यां में फंसी पड़ी छै जिकी नै आधा दामां में ईं लोग लेवै कोनी। ‘मरुवांणी’ अर दूजा कामां में जिंदगी रा तीस नैड़ा बरस खोया अर सरू सरूपोत री कोसीसां में 12 बरस बेकार गमाया, वै आज अखरै। साहितिक छेत्र रौ नुगरापणौ अर ओछापणौ तौ बौपार में ईं कोनी लाधै। आज म्हैं औ अनुभव करूं। म्हैं चावतौ तौ म्हारी खुद री बीसां-तीसां पोथी निकाळ सकतौ हौ।
म्हैं नौकरी नीं छोडतौ, तौ आज म्हारै बळबूतै सारू घणै ऊंचै पद पर पूगतौ या बौपार ई करतौ तौ घाटै में कोनी रहतौ।
तेजसिंघ जोधा : राजस्थांनी में लेखण री मौजूदा हालत आपनै कैड़ी लागै, किण-किण भांत रा नुगस दीखै? नवा-जूना लेखकां नै आप किण-किण बात री भोळावण देबौ चास्यौ?
रावत सारस्वत : सब सूं खटकण वाळी बात तौ या छै के लोग लिखण सूं पैला, लिख्यां पछै या छप्यां पछै ई दूजां री राय नीं जांणणी चावै। वै तारीफ ई सुणणी चावै। रचनावां नै छापण सूं पैला मांजण री चेस्टा कम छै। विदेसां में अेक-अेक चीज रा 7-8 तांईं ड्राफ्ट कर्या जावै। पण अठै अेक वार मांड्यां पछै उण री आधी नकल ई सायद ई त्यार करै।
छंद में लिखौ या बिना छंद में काव्य में अेक सुभाविक प्रवाह, गती, लय आद तौ हुवै ई। पण लोगां नै न तौ यां रौ ग्यांन अर न इण नै महतव देवै। खुद रै मगज में जंवगी सो ई ठीक।
आलोचणा लोग सुणबौ नीं चावै। भूमिका वा ई लिखावै, जिण में तारीफ होवै। इण सूं भूमिकावां रौ मोल जातौ रैयौ। आलोचणा, सुझाव, बरदासत् करण रौ मादौ कोनी। आलोचणावां ईं बिना सिर-पैर री होवै। ‘जमा नहीं’ बेकार है आद फिकरैबाजी ई रैगी। आलोचणा में गुण-दोस छांट-छांट’र बतावौ अर सुझाव देवौ, जद तौ बात बणै।
अेक तौ खांमी आ के लेखक पढै कमती, दूजी नकल में बेसी रुची राखै। हिंदी सूं राजस्थांनी में नई कविता घणकरी नकल छै। आपरै च्यारूंमेर देख’र आपरा संस्कारां मुजब रचना करणियां लोग साव थोड़ा छै।
नया-पुराणां रौ झगड़ौ ई दीखै। साहित नीं कदै नयौ छै, नीं पुरांणौ। वौ सास्वत छै। जिण में दम होसी, वौ समाज में टिकसी, बाकी आपै मिट जासी। इण वास्तै नया-पुराणां री दळबंदी अर पाळैबाजी बेकार छै। इण थूका-फजीती में बगत नीं गमा’र कांम करतौ रहणौ चाहिजै। आखिर सैयोग सूं ईं सगळा कांम चालै। गरम खून नै सही दिसा पकड़णी चावै। जे अन्यावां खातर सांचली रीस छै, तौ दूजा रास्ता घणा छै। समाज में हर-पळ, पग-पग घणा अन्याव होवै। साहित में तौ इसी बाती ई कोनी। वठै तौ आप आपरा विचार छै। जे आज ई कोई ढालां-तलवारां रा दूहा मांडै तौ भलां मांडौ, समाज अर बगत आपै ई परख कर लेसी।
अेक बात या ई दीखै के लोग पोथी छपावण री जल्दी घणी राखै। नीं रचनावां नै परकै, अर नीं राय लेवै, नीं छपाई बाबत विचार करै। तुरत ले’र झोळै में घाल चालता बणै। सैयोग चावै बेचणैं में। वठै कोई झगड़ौ कोनी। पुरांणा ई नया री पोथी बेच सकै तौ ठीक छै। किसी रचनावां भेळी करणी छै, किसी नीं, यौ विचार ई कोनी राखै। सब ढंग रौ मसालौ भेळौ कर’र पोथी त्यार होणौ चायै। अेड़ी पोथियां सूं निरासा नीं होवै, तौ कांईं होवै?
तेजसिंघ जोधा : कांईं ‘माणक’ री मारफत आप राजस्थांनी समाज सूं ईं कीं बतळावण करस्यौ? भोळावण के ओळमें री कीं बात?
रावत सारस्वत : राजस्थांनी समाज नै हाल आपरी ओळख खुद नै ई कोनी। बंगाल, आसांम, उड़ीसा, मद्रास आद में पीढ्यां सूं बैठा लोग वठै पराया छै। वै वठै बैठ’र राजस्थांनी पणौ महसूस करै, पण राजस्थांन में हाल बीकानेरी, मेवाड़ी, मारवाड़ी, आद भावनावां छै। जद ई अठै राज री अर दूजा सरकारी निगमां री ऊंची नौकरियां में बारला लोग भर्या पड़्या छै। अठारा लोग तौ चपरासी, मजूर अर घणी करौ करौ तौ क्लर्क ई बण सकै छै। धीरै-धीरै राजस्थांनी री हालत इण मांमलै घणी खस्ता हो जासी अर यौ चपरासियां अर रिक्सा चलावणियां रौ प्रदेस बण’र रह जासी। इण वास्तै राजस्थांन रा लोगां में आपरी भासा, संस्कती अर प्रदेस खातर प्यार अर सनमांन जागणौ चाहिजै। म्हैं या बात नीं कैवूं के ‘सन ऑफ सोयल’ जिसौ कोई आंदोलन चलायौ जावै या देस री अेकता नै किणी ढंग सूं कमज़ोर करी जावै, पण आपणा हकां री रक्षा करणौ तौ आपणौ फरज छै ई।
आज, जे जांच-पड़ताळ कर देख्यौ जावै तौ ऊंची नौकरियां में 75 फीसदी लोग बारला छै। वां रा हित क्यां में छै, या बात छांनी कोनी। राजस्थांनी भासा रौ आंरौ होयां सूं इण बाढ माथै रोक लाग सकै। राज करण्या अफसर जनता री भलाई अर उणरी तकलीफां तद ई जांण सकै जद उण जनता री संस्कती सूं सैंधा होवै। इण वास्तै ई राजस्थांनी भासा रौ प्रचार प्रसार अर मांनता जरूरी छै।