राजस्थानी नै मानता अवस मिळसी : पुरुषोत्तम स्वामी

 

पुरुषोत्तमदास जी स्वामी रौ जलम सन 1913 में बीकानेर में होयौ। आप राजस्थानी हिन्दी अर संस्कृत रा मानीता विद्वान। अबार स्वामीजी ‘राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान बीकानेर’ रा पीठाधिपति अर ‘राजस्थानी गंगा’ नांव री तिमाही पत्रिका रा संपादक। मूळ रूप सूं आप विज्ञान रा विद्वान। स्वामीजी संयुक्तराज्य री अमेरिका ओहायो स्टेट युनिवर्सिटी सूं रासायनिक अभियांत्रिकी अर सिरेमिक प्राविधि में अेम. अेस. परीक्षा पास कीधी अर केई नौकरियां रै पछै सन् 1970 में केमिकल अेंड सिरेमिक अभियता पद सूं रिटायर होया। स्वामीजी केई बरसां तांई बीकानेर रा महाराजा करणीसिंहजी अर वां रा छोटा भाई अमरसिंहजी रा विज्ञान-शिक्षक रह्या। रिटायर होयां पछै आप पूरी तरियां राजस्थानी री सेवा में लागियोड़ा। पुरुषोत्तमदास जी स्वामी सूं ‘माणक’ सारू आ बतळावण कीधी—इसरार हसन कादरी।

 

इसरार हसन कादरी :  आपनै साहित्य रौ शौक किंयां लाग्यौ अर राजस्थानी भाषा रै बारै में आपरा विचार कांई है?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : म्हारौ परिवार अेक धार्मिक विचारां रौ परिवार हौ। म्हारा पिताजी पुजारी अर कथावाचक हा। म्हारा सबसूं बडा भाई संस्कृत रा धुरंधर विद्वान हा। तीसरा भाई हिन्दी अर राजस्थानी रा उच्चकोटि रा पंडित हा। म्हारा अै दोनूं अग्रज लेखक भी हा। म्हारा पिताजी पं. जयश्रीरामजी स्वामी रोजीना झांझरकै ऊठ’र भजन गाया करता, म्हारै आगै आज भी बौ समै आवै जद बै गाया करता—‘कान्हा लाडूड़ौ सो लै रे, म्हनै दही बिलोबा दै रे।’ म्हारौ साहित्य रै प्रति लगाव इणीं वातावरण रै कारण होयौ। हिंदी अर संस्कृत भाषा रै ग्रंथां रै अध्ययन में म्हारी रुचि बचपण में ई होयगी। राजस्थानी भाषा रै प्रति लगाव इण कारण भी होयौ के म्हारा दो बडा भाई जका संस्कृत रा विद्वान हा—बीकानेर सूं बारै नागौर में रैवता। अर बीकानेर में तो म्हारौ घणौ संपर्क नरोत्तमदासजी रै सागै ई रह्यौ। घर में सगळा जणा राजस्थानी मे ई बोलता। राजस्थानी आपां री प्रदेश री भाषा है, मायड़ भाषा है, इण कारण इणनै आपरौ वाजिब हक मिलणौ ई चाहिजै। मां अर जलमभोम अै दोनूं सबसू बढ’र मानीजिया है—जननी, जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। हूं इण में अेक तीसरी चीज और जोड़णी चावूं। बा है मां री बोली मतलब के मायड़ भाषा।

 

इसरार हसन कादरी : प्रांतीय अर राष्ट्रीय स्तर माथै राजस्थानी साहित्य में आपरी उपलब्धियां अर पोथ्यां कित्ती छपी? आप ‘राजस्थानी गंगा’ रौ संपादन अर प्रकाशन कद सूं कर रह्या हौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : म्है जद तेरह-चौदह बरस री ऊमर में लिखणौ सरू कर्‌यौ, मतलब के सन् 1926-27 में उण बगत सगळा ई लेखक अर रचनाकार हिंदी में ई लिखता। राजस्थानी री वकालत भी उणां नै हिंदी में लेख लिख’र करणी पड़ती। म्हैं म्हारौ लेखन राजस्थानी में सरू कर्‌यौ। म्है सरू में भजन अर पद बणाया करतौ। मीरां अर सूर रा पदां रै अनुकरण माथै म्हैं लगैटगै दो सौ-तीन सौ पद बणाया। म्हनै संगीत री जाणकारी बिल्कुल ही कोनी, पण सौभाग्य सूं म्हारा पिताश्री इणमें पारंगत हा। बै म्हनै वां पदां री राग-रागणियां गाय’र बता देवता अर हूं लिख लेवतौ। म्हारी पैली छपी रचना गुजराती री अेक प्रेम कहाणी ‘प्रेम की पराकाष्ठा’ ही, जिकी मारवाड़ मूंडवै सूं निकळण आळै मासिक पत्र 'कांडल विप्र हितैषी' में छपी ही। म्हारा घणकरा लेख जिका विज्ञान सूं संबंधित हा, केई सामाजिक अर साहित्यिक भी हा— ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘चांद’, ‘माधुरी’ ‘कमलिनी’, ‘प्राची’, ‘वीणा’, ‘राजस्थानी साहित्य’ ‘लेखक’, ‘राजस्थानी भारती’, ‘जागती जोत’, ‘राजस्थानी गंगा’ वगैरह पत्र-पत्रिकावां में छप्या।

 

म्है राजस्थानी, हिंदी अर अंग्रेजी में रचनावां करी है। प्रकाशित पोथ्यां बहोत घणी कोनी क्यूं के हूं परिणाम री बजाय गुण में ज्यादा विसवास करूं। आखिर पं. चंद्रधरजी गुलेरी, जका राजस्थान रा ई मान्या जावै— वै ज्यादा सूं ज्यादा तीन कहाण्यां ई लिखी, पण बै आज हिंदी रा उच्च कोटि रा लेखक मान्या जावै, उणां री कहाणी ‘उसने कहा था’ हिंदी साहित्य री अेक श्रेष्ठतम रचना है। म्हारी प्रकाशित पोथ्यां में ‘विज्ञान के पथ पर’, ‘नूतन रसायन विज्ञान’, ‘रत्न विज्ञान’, ‘डेज ऑफ राजस्थान’, ‘कास्मिक इन्डस्ट्री इन राजस्थान’ वगैरा है। म्हनै बीकानेर राज्य साहित्य सम्मेलन रै चुरू में हुयै चौथै अधिवेशन में जिकै री अध्यक्षता ठाकुर रामसिहंजी करी सन् 1943 में म्हारी अप्रकाशित पोथी 'दैनिक जीवन मे विज्ञान' माथै श्री गिरधारीलाल टांटिया पुरस्कार मिल्यौ हौ। सादूळ राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट बीकानेर रौ संस्थापक फैलो बणण रौ भी म्हारौ सौभाग्य रह्यौ।

 

‘राजस्थानी गंगा’ रौ संपादन—इण री सरूआत सूं ई, मतलब 1985 सूं, कर रैयौ हूं। प्रथम ‘अवतरण’ अंक रौ हूं प्रबंध संपादक हौ पण प्रवाह नांव रै दूसरै अंक सूं संपादन रौ पूरौ भार म्हनै ई संभाळणौ पड़्यौ। डॉ मनोहरजी शर्मा भी संपादन रै काम में आपरौ योगदान करै है।

 

इसरार हसन कादरी : देस रै बारै आपनै राजस्थानी भाषा रौ प्रचार करणै रौ मौकौ मिल्यौ कांई? अगर हां, तो कद?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : हां, 1945 में जद हूं करीब तीन बरसां खातर संयुक्त राज्य अमेरिका में आगै भणण सारू गयौ हौ, वठै आपरी भाषा रै अलावा दो और भाषावां रौ ज्ञान जरूरी हौ, अेक तो इण खातर जर्मन भाषा नै चुणी, दूजी पैली तो रूसी भाषा ली, पण बाद में आ मालूम पड़्यां के भारतीय छात्रां वास्तै अंग्रेजी भी दूजी भाषा होय सकै—म्हैं रूसी री जग्यां अंग्रेजी ले ली। अंग्रेजी रै ज्ञान री जांच वास्तै नियुक्त अंग्रेजी विभाग रै प्राद्यापक नै अेक निबंध लिख’र देवणौ पड़ै। म्है इण निबंध रौ विषय राजस्थानी भाषा अर उणरौ साहित्य लियौ अर लेख तैयार कर’र प्राध्यापक महोदय नै देय दियौ। उणां उण निबंध नै बांच’र खूब प्रशंसा करी अर कह्यौ के इणमें दिरीजी सामग्री सूं म्हारौ घणौ ज्ञानवर्दधन होयौ। उणां झट अंग्रेजी री अपेक्षित योग्यता बाबत म्हनै प्रमाण-पत्र दे दियौ।

 

इणरै अलावा केलिफोर्निया रै लास अेंजेलस नगर में अपणै व्यावसायिक अर प्रावैधिक प्रशिक्षण रै दौरान म्हैं अेक अमेरिकन परिवार रै सागै पेइंग गेस्ट रै रूप में रैवतौ हौ। अेकर उण परिवार रै सदस्यां रै आगै म्हैं राजस्थानी रै प्रसिद्ध लोक गीत ‘पणिहारी’ नै गाय’र सुणायौ अर उणरौ अंग्रेजी अनुवाद कर्‌यौ। बै उण गीत नै सुण’र अर अंतरभूत मर्म नै जाण’र घणा राजी होया। इण तरै रा केई संस्मरण है।

 

इसरार हसन कादरी : प्रादेशिक अर राष्ट्रीय स्तर माथै राजस्थानी भाषा री सरकार उपेक्षा करै। आपरी निजर में इणरौ कारण कांई है?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : राजस्थानी आपां रै राजस्थान प्रदेश री भाषा है, पण राज-काज में उणरौ तो कांई हिंदी रौ भी पूर्णत: उपयोग अबार को हुय रह्यौ नीं। इण कारण अगर कह्यौ जावै के इणरौ कारण राज्य सरकार री राजस्थानी रै प्रति उपेक्षावृति है, तो वौ सांच सूं घणौ दूर कोनी। इणरौ कारण म्हारै ख्याल सूं औ है के राज्य कर्मचारी अेक लंबै अरसै सूं अंग्रेजी में काम करण रा अभ्यस्त हुयगा है। उणां नै इण भाषा रौ विस्थापन चोखौ को लागै नी, क्यूंकै उणां नै हिंदी के राजस्थानी मांय लिखण सारू प्रयास करणौ पड़ै, नुंवी चीज हरेक नै बुरी लागै। विनिमय री जग्यां अेक्सचेंज उणां रै दिमाग में लिखती बगत झट सहज रूप सूं आ जावै। पण म्हारौ मानणौ है क राजस्थानी रौ व्यवहार सगळै पत्र-व्यवहार में कर्‌यौ जावै। दूजा प्रदेशां अर केन्द्रीय सरकार सूं पत्र-व्यवहार करती बगत राजस्थानी मूळ-पत्र रै सागै हिंदी अर जठै प्रादेशिक राज्य भाषावां होवै, वठै उणरौ अनुवाद भी भेज्यौ जावै। इणरै अलावा राजस्थानी नै प्राथमिक शिक्षा में स्थान नीं देवणौ उणरै सागै घोर अन्याव है।

 

इसरार हसन कादरी :  आप राजस्थानी भाषा रा प्रमुख साहित्यकार हौ, इण बाबत आपरा कांई विचार है?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : हूं तो मायड़ भाषा रौ अेक मामूली विनम्र सेवक हूं। म्हनै राजस्थानी माथै बडौ गौरव है अर हू चावूं के वा आपरौ न्यायोचित स्थान बेगौ सूं बेगौ ग्रहण करै। उणनै अविलंब संवैधानिक मान्यता मिलै अर आपां सब लोग उणनै समृद्ध बणावण खातर अेकजुट होय’र लाग जावां।

 

इसरार हसन कादरी : देशी रियासता रै बगत अर अब रै बगत में आप राजस्थानी री स्थिति में कांई फरक समझौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : देशी रियासतां रै बगत राजस्थानी भाषा नै ज्यादा ऊंची जागा मिल्योड़ी ही। बीकानेर रियासत में तो न्यायालय में अर भूमि आलेखां में राजस्थानी रौ प्रयोग हुवतौ, रियासतां रा शासक, जिण में स्वर्गीय गंगासिंह जी अग्रगण्य हा—जनता नै जद भी संबोधित करता, आपां री भाषा में ही बोलता।

 

आज राजस्थानी साहित्य री अभिवृद्धि तो उण बगत सूं बेसी हुई है, जिकौ स्वाभाविक है अर आ नीं हुवती तो बा बडै दुख री बात हुवती। पण ओजूं भी इण भाषा रै भंडार में भरण सारू घणी सारी चीजां री कमी है, जिकै नै मिटावणी आपां रौ अेकांत कर्तव्य है।

 

इसरार हसन कादरी : आप राजस्थानी भाषा रै भविष्य रै बाबत कांई सोचौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी  : हूं सोच रह्यौ हूं अर आ कैवूं के हूं सपनौ देख रह्यौ हूं, क्यूंके हूं तो अेक स्वप्न सृष्टा हूं—के भविस में राजस्थानी पूर्णत मान्य भाषा होसी। हरेक राजस्थानी आपरै सगळा कामां में इणरौ उपयोग करसी।

 

इणरै साहित्य री विविध विधावां में उच्च कोटि रै ग्रंथां रौ सिरजण होसी। साहित्य सूं म्हारौ तात्पर्य है— बौ साहित्य जिकै में उपन्यास, नाटक, कहाणी, कविता रै अलावा भाषा विज्ञान, इतिहास, भूगोल, नाना भांत रौ विज्ञान, व्यापार-व्यवसाय अर तकनीकी अर्थात प्राविधिक साहित्य री भी गणना होसौ। औ समृद्ध साहित्य इस्यौ होसी जौ विश्व ख्याति रौ, प्रथम कोटि रौ साहित्य समझ्यौ जासी अर दूसरा भाषा-भाषी लोग आपरी जाणकारी बधावण खातर इणरौ अध्ययन करसी।

 

इसरार हसन कादरी : दूजी भाषावां री तुलना में राजस्थानी भाषा रै पिछड़ैपण रौ कारण कांई समझौ हौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : जठै तांई साहित्य री सामान्य विधावां रौ सवाल है, राजस्थानी दूसरी भाषावां सूं घणी पिछड़्योड़ी कोनी। दूसरी विधावां में इणरौ साहित्य नगण्य सो है। इणरौ कारण औ है के लेखक नै ग्रंथ लिख्यां पछै प्रकाशक दोरा मिलै। ग्रंथ छप्यां पछै उणनै खरीद’र पढणवाळा तो नगण्य सा ई है। पोथ्यां छप’र पुस्तकालयां री शोभा भलांई बधावौ, उणां नै दूजा ग्राहक तो शायद ई मिलै। दूजी भाषावां रै ग्रंथां रै प्रकाशकां रै सामै ई आ समस्या है, पण आ इत्ती गंभीर कोनी। इणरौ अेक कारण ओ है के मंहगाई रै इण जुग में जठै मिनख नै आपरी दैनिक जरूरतां पूरी करण खातर परिवार रै पालण पोषण वास्तै मुस्किल आय रह्यी है, उणसूं आ आशा करणी के बो आपरी जेब सूं पचास-साठ रुपिया खरच’र कोई किताब खरीद’र ज्ञानवृद्धि खातर पढसी, फिजूल-सी है। उणनै इत्तौ बगत भी कोनी मिलै के बौ पुस्तकालयां सूं पुस्तक लेय’र पढै अर ज्ञानार्जन करै। हाल में ई हुयोड़ी डाकदर में बढोतरी इण समस्या नै गंभीर बणासी। शिक्षा रौ निम्न स्तर भी इण समस्या रौ अेक बडौ भारी कारण है। आपां रै प्रदेश री लुगायां में जद तांई शिक्षा रौ प्रसार नीं होसी, बठै तांई इण भाषा रै साहित्य रौ प्रचार-प्रसार अपेक्षित मात्रा में होवणौ संभव कोनी।

 

शिक्षा रौ प्रसार बधै, राज्य सरकार अर केन्द्र सरकार भी मदद करण नै आगै आवै, चोखी पोथ्यां कम दामां में उपलब्ध कराई जावै अर राजस्थानी विद्वान राजस्थानी नै समृद्ध बणावण खातर अथक प्रयत्न करै, तो ओ पिछड़ौपण मिट सकै।

 

इसरार हसन कादरी : आप राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान बीकानेर मांय किण पद माथै हौ? संस्थान री गतिविधियां रै बारै में कीं बतावौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : म्हैं पीठाधिपति रै पद माथै काम करूं। राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान री संस्थापना राजस्थानी रा प्रकांड पंडित राजस्थानी त्रयी रा प्रमुख सदस्य स्व. श्री नमोतमदासजी विकम सं. 1978 में करी। बै सरू में इणरा साहित्यमंत्री हा। इण संस्थान रौ नांव दो-तीन वार बदळीज्यौ। राजस्थानी साहित्य सभा सूं आ राजस्थानी साहित्य पीठ अऱ अंत में राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान बणी। सरू-सरू में इण संस्था सूं राजस्थानी नांव री अेक हस्तलिखित पत्रिका निकाळी जावती। आदरणीय विद्याधरजी शास्त्री इण संस्था रा प्रथम सभापति हा। सन 1974 में इणरौ पुनर्गठन होयौ अर आ पुनर्गठित होयी। पुनर्गठित संस्थान रा पीठाधिपति नरोत्तमदासजी स्वामी बण्या। उण बगत सूं इणरौ पीठाध्यक्ष हो। स्वामीजी रै निधन पछै पीठाधिपति पद पर म्हारौ चुणाव सन 1983 में होयौ। संस्थान उण साल रै अंत में ‘वंदना’ शीर्षक सूं अेक स्मारिका रौ प्रकाशन कर्‌यौ, ज्ञानपीठ संस्थान अेक तिमाही पत्रिका राजस्थानी में निकाळणै रौ निश्चय कर्‌यौ, इणरौ नांव ‘राजस्थानी गंगा’ राख्यौ गयौ अर इणरौ प्रवेशांक ‘अवतरण’ नांव सूं 2 जनवरी 1985 नै स्व. स्वामीजी री जन्मतिथि माथै प्रकाशित होयौ। दूजौ अंक ‘प्रवाह’ नांव सूं अक्टूम्बर 1985 में निकळ्यौ। 1986 सूं इणरा अंक नियमित रूप सूं निकळ रह्या है। स्वामीजी रै अप्रकाशित साहित्य नै प्रकाश में लावणौ इण पत्रिका रौ अेक मोटौ काम है।

 

इणरै अलावा राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान केई योजनावां हाथ में लेवण रौ इरादौ राखै। पण धनाभाव रै कारण औ इरादौ पार कोनी पड़ रह्यौ। हूं आशा राखूं के ओ संकट बेगौ ई दूर होसी। संस्थान आई साल 'श्री फूलचंद बांठिया राजस्थानी पुरस्कार' ई देवै।

 

इसरार हसन कादरी : ‘माणक’ रै बारै में आपरा कांईं विचार है?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : ‘माणक’ अेक घणी फूठरी पत्रिका है। इणरौ प्रचार-प्रसार भी दूर-दूर तांई है, इणमें ओजूं घणकरी कविता, कहाणी वगैरा ई दिरीजै। आ विविध विषय विभूषित पत्रिका होवणी चाहिजै। इणनै और आकर्षण बणावण खातर कागज कीं और चोखौ प्रयोग में आवै तो ठीक रैवै। ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ वगैरा जैड़ौ। अगर इणरा अंक हरेक महीनै रै पैलै हफ्तै में ग्राहकां कनै पूग सकै तो सोनै में सुगंध होय जावै। हूं ‘माणक’ रै विकास री कामना राखूं।

 

इसरार हसन कादरी : आप देश-प्रदेश रा सगळा राजस्थानियां नै ‘माणक’ रै माध्यम सूं कीं संदेश देवणौ चावौ?

 

पुरुषोत्तम स्वामी : उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधज—म्हे जागां, उठ खड़ा हुवां अर राजस्थानी नै समृद्ध बणावण खातर तन-मन-धन सूं जुट जावां। औ ई म्हारौ राजस्थानी रै करोड़ूं लोगां नै निवेदन है। आपां आपां रै हरेक काम में बोलण-चालण लिखण-पढण में राजस्थानी रौ व्यवहार करां, औ ध्येय मायड़ भाषा रै प्रत्येक व्यक्ति रै सामनै रैवणौ चाहिजै।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम स्वामी सूं इसरार हसन कादरी री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मई 1987
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