रचनाकार सामाजिक संवेदना जगावै
मीठेश निरमोही : आपरी सरूआत अर अबार री कवितावां में कांई फरक है?
सत्यप्रकाश जोशी : म्हारी आं कवितावां में ‘वेरायटी’ रौ फरक है। लय-छंदां में फरक है। सबदां में फरक है। ‘बोल भारमली’ में नारी उछाळौ है। वे सेक्स री कवितावां है। ‘जोड़ायत’ में सगाई अर ब्याव रै बीचलै रिस्तै नै छेहली जगै पुगावै। या कैय सकूं क ‘जोड़ायत’ में अंत:लोक री कवितावां है। म्हारौ आगलौ विकास नवी कवितावां में आपौ-आप सामी आसी। ‘लस्कर ना थमै’ में ‘वॉर’ रै खिलाफ कवितावां है। म्हैं अे कवितावां सन 1968 में लिखी ही। सन 1969 में बोरुंदा में छपी ही। पण प्रकासक बांध नै धरदी। बीस बरसां बाद वो संग्रै अबै पाछौ छपैला। म्हैं आं कवितावां में जुद्ध-विरोधी अदभुत प्रयोग करियौ है।
म्हारी कवितावां में छंदां, भाषा अर विषयां सूं संबंधित अनाप-सनाप नवा प्रयोग हुया है। आज तांई स्यात् ई इण तरै रा प्रयोग राजस्थानी में लिखीजी कवितावां में हुया हुवैला। म्हारौ तो कैवणौ है अैड़ा प्रयोग भविस में ई नीं हुय सकै।
मीठेश निरमोही : आपरी दीठ में राजस्थानी रै नामी कवियां में कुण-कुण है?
सत्यप्रकाश जोशी : नामी तो कोई है इज कोनीं। पण परंपरा सूं जुड़’र लिखणियां में मेघराज ‘मुकुल’, गजानन वर्मा बुद्धिप्रकाश पारीक, रेवतदान चारण, दुर्गादान, रघुराजसिंह हाड़ा, कुसुम जोशी अर नारायणसिंह भाटी रा गीत म्हनै चोखा अर मीठा लागै।
मीठेश निरमोही : आपरौ दीठ में नवी पीढी रा वै कवि, जिका चोखा लिख रैया है?
सत्यप्रकाश जोशी : नवी पीढी रा आं रचनाकार सत्येन जोशी, पारस अरोड़ा, नंद भारद्वाज अर थांरौ (मीठेश निरमोही) ई नांव भेळौ है—रै अलावा आईदानसिंह भाटी, प्रेमजी प्रेम, जुगल परिहार, चैनसिंह परिहार इत्याद चोखा लिख रैया है। आं सगळा लेखकां रौ आंटौ जोरदार है। घणी उम्मीदां है आं रचनाकारां सूं। नंद भारद्वाज कवितावां रै सागै आलोचना में ई घणौ महताऊ काम कर रैयौ है। दोनूं ई विधावां में तो घणौ आछौ लिखै।
मीठेश निरमोही : राजस्थान री गद्य विधावां में कीं गिणावणजोग नांव?
सत्यप्रकाश जोशी : निबंधकारां में जहूरखां मेहर टणकौ अर ठावकौ नांव है। ज्यूं जहूर रै हाथ में निबंध रौ आंटौ है, थारै हाथ में कहाणी लिखण रौ। ‘माणक’ में जुगल परिहार रा लेख जोर रा है। अर्जुनदेव चारण रा नाटक कूंपळ रूप में सरावणजोग है। सांवर दइया सूं म्हैं घणौ प्रभावित हूं । वो चोखी कहाणियां लिखी। नृसिंह राजपुरोहित पैली-पैली प्रेमचंद सूं घणौ प्रभावित हौ, आजकाल चोखी कहाणियां लिखै है। अन्नाराम ‘सुदामा’, बैजनाथ पंवार, मालचंद तिवाड़ी ई चोखौ लिखै।
मीठेश निरमोही : कांई आपरी दीठ मे बिज्जी (विजयदान देथा) कहाणीकार कोनीं?
सत्यप्रकाश जोशी : विजयदान तो आज तांई लोककथावां भेळी करी है, लोककथावां नै आपरी निजू कहाणियां बताय’र हिंदी-जगत नै भरमाय रैयौ है। हिंदी रौ लोक ई घणौ कमजोर है कै वो उणनै मौलिक लेखक मान बैठौ है।
मीठेश निरमोही : ‘हरावळ’ निकाळण रौ विचार आपनै कियां आयौ? ओ मासिक सरू कर्यौ तद कांई-कांई अबखायां सामी आई? आपरौ अनुभव कांई रैयौ?
सत्यप्रकाश जोशी : झोळी-डंडा ले’र म्हैं बोरुंदा छोड चुक्यौ हौ। टैम वो हौ जद रोटी रा ई टोटा पड़ण लाग ग्या हा। जीवां कीकर? खावां कांई? टाबरां नै कियां पाळा-पोसां अर भणावां? म्हैं विचार कर्यौ—बंबई आयग्यौ हूं, विज्ञापन जुटा’र पत्रिका निकाळी जाय सकै। पेट भरियौ जाय सकै। अर म्हैं हरावळ निकाळण री धार लीवी। ‘हरावळ’ निकाळ्यौ। खूब विज्ञापन लिया। म्हारी रोजी-रोटी रौ साधन बणग्यौ ‘हरावळ’। मिसाल रैवैला क म्हैं ‘हरावळ’ जैड़ी लघु पत्रिका निकाळ’र नौकर राख्या। लेखक त्यार कर्या। ‘हरावळ’ री खातिर ‘डोर टू डोर’ फिर्यौ। सेठां सामी भिखारी बण्यौ। सेठां सूं विज्ञापन मांगणौ ई भीख ई तो है। पण सेठां री निजरां में म्हैं पक्कौ साधू बणग्यौ हौ। खूब जमाई आ पत्रिका। नांव ई खूब हुयौ। ‘हरावळ’ सूं समकालीन राजस्थानी साहित्य खूब प्रकासण में आयौ।
मीठेश निरमोही : पछै ‘हरावळ’ बंद क्यूं कर्यौ?
सत्यप्रकाश जोशी : म्हैं अस्वस्थ रैंवण लागग्यौ हौ, दौड़ धूप करण री सरधा नीं रैयी, सो नीं चावता थकां ई इणनै बंद करणौ पड़्यौ। पण केई खाटा-मीठा अनुभव रैया। म्हनै हरख है क ‘हरावळ’ नंद भारद्वाज, पारस अरोड़ा, सांवर दइया, कुंदनकिशोर जैड़ा लेखक त्यार करिया, जिणां री पेठ आज राजस्थानी रै समकालीन साहित्य में है।
मीठेश निरमोही : राजस्थानी री लघु पत्रिकावां बाबत आपरौ कांई सोचणौ है?
सत्यप्रकाश जोशी : राजस्थानी लघु पत्रिकावां नै सरकारी विज्ञापन मिलणा चाइजै। राजस्थान सरकार प्राथमिकता सूं जे लघु पत्रिकावां नै मध्यप्रदेश सरकार री भांत विज्ञापन देवै तो राजस्थानी रौ भलौ हुय सकै। अकादमियां कानी सूं बेसी सूं बेसी सैयोग मिलै अर सरकारी स्तर माथै आं पत्रिकावां री कम सू कम पांच-पांच सौ प्रतियां री खरीद हुवै, अैड़ी व्यवस्था राजस्थान सरकार नै करणी चाइजै।
मीठेश निरमोही : रेडियो अर टी.वी. आज जन-जन सूं जुड़ियौ थकौ मीडियो है। राजस्थानी भाषा अर साहित्य रै विगसाव सारू कीं सुझाव?
सत्यप्रकाश जोशी : अबार टी.वी तो टाबरां नै मानसिक रूप सूं विकलांग बणाय रैयी है। यूं भारत विविधता सूं भरियोड़ौ है। आं मीडियां सूं विविध संस्कृतियां नै माध्मय बणा’र आदमी आदमी नै जोड़ण री भावनावां सूं कार्यकम प्रसारित हुवणौ चाइजै। भारतीय भाषावां रै साहित्यां रौ प्रसारण ई समान रूप सूं हुवणौ चाइजै।
मीठेश निरमोही : हरेक प्रांत री न्यारी न्यारी मायड़भाषा है अर राष्ट्रभाषा है हिंदी। हिंदी भाषा अर हिंदी रचनाकारां रै बाबत आपरा कांई विचार?
सत्यप्रकाश जोशी : हिन्दी नै जमीं सूं जुड़ियोड़ी भाषा कुणी कोनीं मानै। इण दीठ सूं हिन्दी जिसी पोची भाषा है, उत्ती पोची दूजी कोई नीं। हिंदी सूं तो म्हैं दूजी भारतीय भाषावां, ज्यूं क बांग्ला, असमिया, तमिळ, तेलुगु, कन्नड़, मलयाळम, मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी इत्याद नै घणी चोखी मानूं। आं भारतीय भाषावां में घणौ चोखौ लिखीज रैयौ है। आं भाषावां में अभिव्यक्तियां रा आपरा निजूं आंटा है।
मीठेश निरमोही : ‘राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी’ बाबत आपरौ कांई कैवणौ है?
सत्यप्रकाश जोशी : ‘राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी’ तो अैड़ा लोग कब्जै कर राखी है, जिण मे कोई सिरजक कोनी। अकादमी रौ विधान इत्तौ गड़बड़ है क उणनै बदळण री जरूरत है। विधान में फेर-बदळ कर’र समकालीन साहित्य सिरजण में लाग्योड़ै लेखकां नै प्रतिनिधित्व दिरीजणौ चाइजै। अकादमी में फगत सिरजणधरमी रचनाकार ई लिरीजणा चाइजै। अकदामी रौ रुतबौ अैड़ौ हुवणौ चाइजै क इणरौ सदस्य बणणौ फक्र री बात हुवै। पण अबार तो राम राजी है। अठै अकादमियां रा उदाहरण तो अै है क भूलै भटकै कोई लेखक अकादमी में है तो उणनै किण तरै विवश कर’र बारै कर दियौ जावै। शोध-लेखक अर नेतावां रौ अखाड़ौ है अै। यूं प्रदेस री सगळी ई अकादमियां राजनीति रा अखाड़ा बण्योड़ी है।
सरकार कानी सूं अकादमियां में अध्यक्ष थोपण री बात बेजा है। अैड़ौ नीं हुवणौ चाइजै। अध्यक्ष लेखकां मांय सूं ई बणाई जणौ चाइजै। कीं सिरजणाऊ काम हुवणा चाइजै। समकालीन साहित्य री कम सूं कम पांचेक पोथ्यां तो न्यारी-न्यारी विधावां में आयै बरस अकादमी स्तर माथै चोखै संपादन में निकळणी ई चाइजै।
मीठेश निरमोही : राजस्थानी री भणाई-लिखाई खातर राज्य सरकार अर शिक्षण संस्थावां सूं आपरी कोई अपील'क राय?
सत्यप्रकाश जोशी : माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अर विश्वविद्याल्यां रै त्हैत जिकी किताबां पाठ्यकमां में पढाईज रैयी है, वे कमजोर है। पाठ्यकम रौ संस्कृति सूं जुड़णौ जरूरी है। सो पाठ्यकम नवै सिरै सूं बणायौ जावणौ चाइजै। पाठ्यक्रम समितियां में सही रचनाकारां नै प्रतिनिधित्व मिलै। सही रचनाकार सूं मतलब साहित्य में उणां री पेठ है।
दस-जमा-दो (10+2) शिक्षण योजना में राजस्थानी अनिवार्य रूप सूं पढाई जावै। दूजी भारतयी भाषावां नै जिण भांत रौ प्रोत्साहन-सैयोग मिल रैयौ है, राजस्थानी भाषा रै विगसाव सारू ई सरकारी स्तर माथै बैड़ा ई जतन हुवणा चाइजै।
मीठेश निरमोही : जे सरकार 10+2 री योजना में राजस्थानी नै नीं लेसी तो?
सत्यप्रकाश जोशी : सरकार जनता सूं ई चाल्या करै। राजस्थानियां नै ई आपरी मायड़ भाषा रै सम्मान खातिर दूजा प्रदेसां रा लोगां सूं प्रेरणा ले’र आंदोलण सरू करणा पड़ैला। इण खातिर रचनाकारां नै ई जन-हित में आपरा निजू स्वारथ त्याग’र आगै आवणौ चाइजै।
मीठेश निरमोही : राजस्थानी भाषा री संवैधानिक मानता खातिर किण तरै रा प्रयास हुवणा चाइजै?
सत्यप्रकाश जोशी : राजस्थानी भाषा री संवैधानिक मानता रौ वातावरण बण रैयौ है। इणरौ पूरौ-रौ-पूरौ फायदौ उणावणौ चाइजै। पण राजस्थान में अेक ई मरद आदमी कोनीं। म्हारौ इसारौ राजनीति कानी है। जे राजनीति में अैड़ौ अेक ई मरद सामी आ जावै तो 15 दिनां रै मांय-मांय राजस्थानी नै मानता मिल सकै।
‘कोंकणी’ भाषा रौ उदाहरण आपां रै सामी है। नेपाली भाषा बण रैयी है। पण दूजा नै दोष दोवणौ बिरथा है। आपां राजस्थानियां रौ लोई मरग्यौ है। पाणी ई नीं रैयौ आपां मांय। तमिळनाडु, केरल के महाराष्ट्र, कर्नाटक री भाषा री बात हुवती तो कदैई मानता मिलगी हुवती। उठै रा आदमी भाषा खातिर मरणो जाणै। शूरवीरां री धरती आज पांगळी हुयगी है। बगत रैवतां आपां नै संगठित रूप सूं सावचेत हुवणौ है। मानता सारू अेक जबरदस्त आंदोलन रौ मारग अपणावणौ है।
मीठेश निरमोही : सुण्यौ है क आप अमेरिका पधार रैया हौ?
सत्यप्रकाश जोशी : हां, आप सही सुण्यौ है। अबै म्हैं भारत छोड’र ‘टिल डेथ’ अमेरिका में ई रैस्यूं। अमेरिका में बैठौ-बैठौ ई मायड़भाषा री सेवा करूंला।
मीठेश निरमोही : किण रूप में मायड़ भाषा री सेवा करस्यौ?
सत्यप्रकाश जोशी : म्हैं अमेरिका में बैठौ-बैठौ राजस्थानी काव्य सिरजण करस्यूं, लोकगीतां अर लोक-कथावां रा अंगरेजी में अनुवाद करस्यूं अर ‘इम्डियन ओरल ट्रेडिशन’ नै ले’र जगै-जगै भाषण देस्यूं। विदेसियां रौ ध्यान राजस्थानी भाषा कानी आकर्षित करस्यूं।
मीठेश निरमोही : समकालीन राजस्थानी साहित्य री सिरजणा में लाग्योड़ै नवै लेखकां नै आपरौ संदेस?
सत्यप्रकाश जोशी : साहित्यकार समकालीन घटनावां नै आपरै लेखन में बेसी सूं बेसी महत्व देवै। आजादी री टैम, देस रै बंटवारै रै बगत, जिण भांत री रचनावां हुई, अर बांग्लादेस बणण रै बगत जिण भांत री वठै रचनावां हुई, वैड़ी रचनावां अब नीं हुय रैयी है। कैवण रौ मतलब वैड़ी सक्रियता अबै नीं। उण दौरान राजस्थानी रा लेखक ई दूजी भाषावां रै लेखकां रै दाई सक्रिय हा। पण आजकाल, सामयिक समस्यावां सूं वै कटता जाय रैया है।
राजस्थान री मुख्य समस्या काळ है, पण काळ माथै रचनावां कठै? रचनाकार री सामाजिक संवेदना मरती लखावै। इणनै जगावणी है। साहित्य रै अलावा साहित्यकारां नै दूजी बातां री जाणकारी ई घणी जरूरी है। बाजार-भावां सूं लेय’र शेयर भावां तांई री जाणकारी ई वांनै हुवणी चाइजै।