राजस्थान री सांस्कृतिक अर इतियासिक संपदा अथाग है
बंबइया फिलमां रौ जंगळ घणौ अबखौ। अर इण अबखै जंगळ रै मांय अच्छौ सिनिमौ आपरौ अपणौ अेक नवौ रस्तौ बणाय लियौ। अर इणी सारथक सिनिमै रा अभिनेता थरपीज्योड़ै विशाळ सितारा-तंत्र री चूळां हिलाय रैया है। जे ओ सारथक सिनिमौ आपरै छेहलै दरसक तांई पूगण में कामयाब हुयग्यौ तो अेक दिन व्यावसायिक सिनिमै रै अमल सूं समाज नै मुगती मिल सकै।
इण सारथक सिनिमै री ‘लिस्ट’ में पैली नसीरुद्दीन शाह अर अबै ओमपुरी—इस्या नांव है, जिणसूं दरसकां नै घणी उम्मीदां है। ‘गोधूलि’, ‘आरोहण’, ‘कलयुग’, ‘चक’ सूं ‘आक्रोस’ अर ‘आकोस’ सूं ‘अर्द्ध सत्य’ तांई ओमपुरी इत्ती विश्वसनीयता अर मैणत रै साथै भूमिकावां निभाई क दरसकां रै बीच आ ई बहस हुई क ‘अर्द्धसत्य’ री लोकप्रियता री बुनियाद ओमपुरी रौ अभिनय ई है।
चीकणा-चुपड़्योड़ा चैरां रै बिच्चै ओमपुरी आम भीड़ में गम जावण वाळौ ठेठ देसी चैरौ है। किणी भांत रौ फिलमी ‘ग्लैमर’ तो ओमपुरी रै व्यक्तित्व में तो छोडौ, दिमाग में ई नीं है। ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ अर ‘कार्लोवी वारी’ सूं सम्मानित आज रै सारथक सिनिमै रा अेक सशक्त कलाकार जद लारलै दिनां श्याम बेनेगल री टी.वी. सीरियल ‘जात्रा’ री शूटिंग रै दौरान जोधपुर पधार्या तो उणां सूं उणां रै फिलमी व्यक्तित्व अर सारथक सिनिमै रै न्यारै-न्यारै पगसां माथै ‘माणक’ का पाठकां वास्तै जकी खास बात-चीत हुई, वा अठै प्रस्तुत है, बात-चीत करी सैयद मुनव्वर अली—
सैयद मुनव्वर अली : आप में अभिनय रै प्रति ललक किंयां पैदा हुई?
ओमपुरी : बात इस्यी है क म्हैं जिण दिनां पटियाला रै ‘खालसा कालेज’ में बी.अे री पढाई कर रैयौ हौ, उण दिनां नाटकां में काम कारण रौ चस्कौ लागग्यौ। अेक-दो ‘प्ले’ में तारीफ कांई हुई, शौक बढण लागौ। ओ शौक म्हनै वठै री चावी नाट्य संस्था ‘पंजाब कला मंच’ रै साथै जोड़ दियौ। आ नाटक कंपनी बारै घूम-घूम’र नाटक करिया करती। पूरै व्यवसायिक रूप में। इण नाटक संस्था सूं जुड़’र म्हैं ई पूरी तरै नाट्यकर्म में लागग्यौ। तीन साल तांई, सन् 1967 सूं ले’र 1970 तांई, म्हैं घूम-घूम’र गांवां में घणा ई नाटक खेल्या, जिणां में हिंदी अर पंजाबी रा नाटक हुया करता। नाटकां रौ ओ शौक म्हारौ अठै तांई ई सीमित नीं रैयौ। इणी ‘ग्रुप’ रै हरपाल दीवान सूं म्हारौ परिचै हुयौ, जकौ क ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ सूं प्रशिक्षण ले’र आया ई हा। वां म्हनै बतायौ क ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ सूं प्रशिक्षण पावण रै बाद कलाकार निखर उठै। बस, पछै कांई हौ। म्हैं म्हारा बिस्तर बांध्या अर चाल पड़्यौ, ‘अेन. अेस.डी.’ में ट्रेनिंग रै वास्तै।
सैयद मुनव्वर अली : ‘अेन. अेस.डी.’ में आप कद तांई रैया अर वठै आप कांई-कांई सीख्यौ?
ओमपुरी : सन् 1970 सूं ले’र 1973 तांई म्हैं ‘अेन. अेस.डी.’ में रैयौ अर इण दरम्यान म्हैं तकरीबन 35-40 नाटकां में काम कर्यौ। वठै म्हनै अभिनय री बारीकियां नै समझण अर क्रियान्वित करण रौ सही अंदाज सीखण नै मिल्यौ।
सैयद मुनव्वर अली : ‘अेन. अेस.डी.’ सूं बंबई तांई रौ सफर आप किंयां तै करियौ?
ओमपुरी : ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ अर ‘फिल्म इंस्टीट्यूट’ सूं बौत कीं सीख’र जद म्हैं 1973 में बंबई आयौ तो म्हारै मन में कोई भरम नीं हौ क म्हनै फिलमी हीरो बणणौ है। बल्कै म्हैं तो अपणै आपनै थियेटर रौ अेक हिस्सौ समझतौ हौ। ‘आर्ट’ फिलमां म्हारै ‘जहन’ में ही। ‘कॉमरशियल’ फिलमां में जावण री तो म्हैं सोच ई नीं रैयौ हौ, सो म्हैं किणी प्रोड्यूसरां रै घरां चक्कर काटण री बजाय सबसूं पैली नौकरी री तलाश सरू कर दी, ताकै म्हैं किणी माथै बोझ नीं बणूं। म्हनै रोशन तनेजा री ‘अेक्टिंग स्कूल’ में नौकरी मिलगी। दिन भर नाटक करियौ करतौ अर शाम रा खुद रै थियेटर ग्रुप ‘मजमा’ में नाटक करिया करता। बस आं नाटकां सूं ई म्हारौ फिलमी सफर सरू हुयौ। म्हारी पैली फिलम गिरीश कर्नाड री ‘गोधूलि’ ही। आ फिलम जनता तांई नीं पूगी। पण इस्यी फिलमां चावा निरमाता-निरदेसक जरूर देख्या करता, सो इण फिलम नै देख्यां पछै वां में म्हारै काम री भरपूर सरावना हुवती रैवती। अर इणी भांत म्हैं छोटा-मोटा रोल करतौ रैयौ।
सैयद मुनव्वर अली : वां छोटी-छोटी भूमिकावां सूं कांई आपनै संतोख हौ?
ओमपुरी : अपणै अभिनय सूं म्हनै पूरौ संतोख हौ। पण दूसरै धंधां री तरियां इण में आरथिक निश्चितता नीं ही। दो बगत री रोटी आराम सूं मिल रैयी ही अर रैवण रौ ठिकाणौ ई हौ।
पछै फिलम ‘आक्रोस’ आई। आपरै बजट रै हिसाब सूं चाली ई घणी। ‘नेशनल अेवार्ड’ ई मिलग्यौ अर अेकर फेर म्हारी तारीफ हुवण लागगी। इणरै बाद आई फिलम ‘अर्द्ध सत्य’ अर पछै देखतां-ई-देखतां सै कीं बदळग्यौ।
सैयद मुनव्वर अली : ‘अर्द्धसत्य’ में आप इत्तौ जीवंत अभिनय किंयां कर पाया?
ओमपुरी : बात इस्यी है क गोविंद निहलानी अर विजय तेंदुलकर ‘अर्द्धसत्य’ री बौत ससक्त पटकथां लिखी। फिलमांकन सरू हुवण सूं 15 दिन पैली म्हनै आ पटकथा दिरीजगी। ओ तरीकौ अच्छै अभिनय रै वास्तै बौत जरूरी हुवै क अेक अभिनेता करीजण वाळै आपरै चरित्र नै पढ’र भलीभांत समझलै। अर म्हैं ओ ई सोच’र भलीभांत समझ्यौ। अर म्हैं ओ ई सोच’र पटकथा केई बार पढी अर समझण री कोसिस करी।
सैयद मुनव्वर अली : आपरी निजरां मे ‘अेक्टिंग’ कांई है?
ओमपुरी : ‘अेक्टिंग’ रौ मतलब ओ नीं कै आप रोवौ तो दरसक रोवै, आप हंसौ तो दरसक हंसै अर आप गावौ तो दरसक ई आपरै साथै गावणौ सरू करदै। बल्कै ‘अेक्टिंग’ रौ मतलब ओ है कै ‘सिचुअेशन’ नै ‘अेक्ट’ नीं करणौ बल्कै ‘अेनालाइज’ करणौ। दरसक रै बजाय उण ‘सिचुअेशन’ रौ विश्लेषण करौ। आदर्श स्थिति आ ई है क ‘इमोशन’ नै कम कर’र उण खयाल नै, उण ‘आइडियै’ नै सामी लावौ, जकौ कै लेखक दियौ है।
सैयद मुनव्वर अली : टी. वी. नै दिरीज्यै साक्षात्कार में आप कैयौ हौ कै आप सबसूं पैली किणी चरित्र री शारीरिकता सूं आकर्षित हुवौ, मतलब उणरौ जकौ शारीरिक अस्तित्व है उणसूं। ‘आक्रोश’ रौ मून इणरौ सबसूं अच्छौ उदाहरण है। आप आपरी भूमिकावां नै विचार अर विश्लेषण रै स्तर माथै देखौ या फगत दैहिक व्याख्या ई करौ?
ओमपुरी : शारीरिक स्तर तो अेक गौण बात है, खास बात तो है उणरै वर्ग चरित्र, उणरौ दिमाग अर उणरी भावनावां। पैदाइश सूं ले’र आज तांई किण-किण हालात सूं नीसर्यौ है वो। उणरौ मानसिक द्वंद्व कांई-किस्यौक है। अभिनेता रै रूप में जद आप उणरी कल्पना करौ कै किंयां-किंया उणरौ विकास हुयौ, तद आप उणरी प्रतिक्रियावां अर वैवार समझ जावौला।
सैयद मुनव्वर अली : सारथक सिनिमै रौ प्रतीक बणण रै बाद आप जे व्यावसायिक सिनिमै सारू काम करौ तो कांई वो आपरी कला माथै खराब असर तो नीं न्हाकै?
ओमपुरी : विस्वास करावौ, बुरौ असर तो आपां सब माथै पड़ रैयौ है। म्हे तीस या चाळीस फीसदी ‘कॉमर्शियल’ फिलमां कर रैया हां। पच्चीस फिलमां कर चुक्यौ हूं, पण हाल तांई म्हैं दो कमरां रौ मकान नीं लेय सकियौ। समाज में सिनिमै री छिब इस्यी है कै आप अेक फिलम करली तो इणरौ मतलब ओ क आप लखपति हुयग्या। पण इस्यौ नीं है। म्हैं हाल तांई इण चीज री कड़वास कदैई परगट नीं कर्यौ। म्हैं छोटै सिनिमै माथै कोई अैसान नीं कर रैया हां। म्हांनै खुदौखुद नै ई इज्जत देवणी है। समाज इसी कोई गारंटी नीं देवै कै थे अच्छी फिलम में काम करौ, म्हां थांनै अच्छौ खाणौ देस्यां। जे म्हैं यूं मानूं कै म्हैं जकी तीस फीसदी बुरी फिलमां करां वा म्है घूस लेवां। तो अब बतावौ हिन्दुस्तान में कित्ता फीसदी लोग इस्या हुसी, जका आपरी ईमानदारी री कमाई माथै जिंदा है। पण आदमी बौत-सा काम इस्या ई करै, जिणां नै कै वो करणा नीं चावै पण फेरूं ई करणा पड़ै।
सैयद मुनव्वर अली : कला फिलमां रौ भविस किस्यौक है?
ओमपुरी : म्हारी निजरां में कला फिलमां रौ भविस उज्जवळ है। कला फिलमां रौ बीजारोपण तो फिलम ‘अंकुर’ रै साथै श्याम बेनेगल कर दियौ हौ, जकौ कै बधतौ थकौ इण हालत में आ पूगौ है क व्यावसायिक सिनिमै नै मात दे सकै। जे आप लारलै दो बरसां री फिलमां माथै गौर करौ तो निश्चित रूप सूं आ बात साफ हुय जावै कै दरसकां रौ रुझाण कला फिलमां री कानी बढ्यौ है, जिणसूं कै फिलम निरदेसकां नै प्रोत्साहन मिल्यौ है। ‘आक्रोश’, ‘स्पर्श’, ‘अर्थ’, ‘मासूम’, ‘मंडी’, ‘जाने भी दो यारो’, ‘अब आयेगा मजा’, ‘अर्द्धसत्य’, इत्याद फिलमां तो खुलै रूप मे व्यावसायिक फिलमां नै चुनौती देय दी है। क्यूं कै दरसकां रै बदळतै रुझान री वजै सूं घणकरी व्यावसायिक फिलमां असफल हुयी है, जदकै कला फिलमां नै लोग बत्तौ महत्व देवण लाग्या। म्हैं समझूं आवण वाळौ बखत कला फिलमां रौ हुसी।
सैयद मुनव्वर अली : आज री व्यावसायिक फिलमां रै बारै में आपरा कांई विचार है?
ओमपुरी : (इण सवाल नै सुणतां ई चैरै माथै आक्रोश रा भाव लियां वे तेजी सूं बोल्या) बकवास है अे फिलमां। भूंडी व्यावसायिक फिलमां माथै अेकदम रोक लगा देवणी चाइजै—‘मार्शल लॉ’ री तरै। भारतीय कला, साहित्य, संस्कृति इत्याद नै कित्ता विकृत कर दी है अे फिलमां। साची मानजौ, आं फिलमां नकली आधुनिकता दिखा-दिखार युवा पीढी नै आपरी ‘गिरफ्त’ (पकड़) में ले’र उणनै केई तरै रै नशां री आदी बणाय दी है। इण सच्चाई नै नकार्यौ नी जा सकै बिलकुल ई निकमा बणाय दिया है, आज रै युवकां नै अे फिलमां। पछै आपां कियां राष्ट्रीय चरित्र री बात कर सकां।
सैयद मुनव्वर अली : आपरी निजरां में सिनिमौ समाज नै किण हद तांई बदळ सकै?
ओमपुरी : सिनिमै रौ असर बौत धीरै-धीरै हुया करै। अर पछै आपां रै अठै सिनिमै री अेक गलत परंपरा है, इण वास्तै असर और ई धीरै हुसी। किणी ई गंभीर फिलम रौ असर हळकौ ई हुसी, कारण के उण में पैली सूं ई पाणी मिल्योड़ौ है। म्हे हाका कर-कर’र कै रैया हां के आ फिलम नीं है थांरी जिनगाणी रौ हिस्सौ है। पण दरसक सारू ओ थोड़ौ मुश्किल पड़सी। इण तरै री फिलमां री अेक परंपरा कायम हुवै तो कीं बरसां रै बाद दरसकां रौ दिमाग अेक इसी स्थिति में आसी, जद फिलम देख’र ओ सोचतौ थकौ सिनिमा हाल सूं बारै निकळसी कै यार अेक्टिग बौत बढिया ही।
हालांकै आपां रै अठै ‘दो बीघा जमीन’ जिसी फिलमां री ई स्वस्थ परंपरा रैयी है, पण उण जमानै में जका लोग फिलम-निरमाण रै छेत्र में आया, वै कठै-न-कठै साहित्य या रंगमंच या संगीत सूं जुड़ियोड़ा हा, इणसूं पैली रौ सिनिमौ आपरी शैली अर आपरी स्थानीयता सूं जुड़ियोड़ौ हौ। पुराणौ गीत आज ई आपांरी संवेदना सूं जुड़ै, पण आज जदकै बारली संवेदनावां ओढली है; तो ओ पतन तो अनिवार्य रूप सूं हुवणौ ई हौ।
सैयद मुनव्वर अली : आपरौ टी.वी. सीरियल में काम कारण रौ मोह अचाणचक किंयां बढग्यौ... आं दिनां आप कुण-कुण-सा सीरियलां में काम कर रैया हौ?
ओमपुरी : अचाणचक तो ओ मोह नीं हुयौ... सबसूं पैली म्हैं ‘खानदान’ में ‘फ्रेंडली अपियरेन्स’ कर्यौ हौ, दो अेपिसोडां में। असल में सीरियल में काम करण री इंछा तो पैली सूं ही, पण म्हैं दो कारणां सूं सीरियल में काम करणौ नीं चावतौ हौ। अेक कारण तो ओ कै टी.वी. सीरियल री स्क्रिप्ट अेक-सी नी लिखीजै। अेक चरित्र में लेखक री इंछा सूं कदैई ई कठैई ई फेर-बदळ हुय सकै। दूजौ कारण ओ क घणकरा सीरियल आछा नीं लिख्या जा रैया है। म्हैं जकां सीरियल में काम कर्यौ है, या कर रैयौ हूं, उणां में लगै-टगै पूरी स्किप्ट पैली ई लिखीजगी ही या लिखीजणी है। या पछै वे पूरी व्यवस्था अर योजना रै साथै बण रैया है।
सैयद मुनव्वर अली : ‘दूरदर्शन’ माध्यम रै बारै में आप कांई सोचो?
ओमपुरी : ‘दूरदर्शन’ अेक ‘केजुअल मीडियो’ है। सही बखत माथै सही कार्यक्रम दिखाये जावै तो इणरी उपयोगिता सारथक हुय सके।
सैयद मुनव्वर अली : कांई आप ‘जात्रा’ रै अलावा और ई कीं सीरियल कर रैया हौ?
ओमपुरी : हां, अेक सीरियल ‘राग दरबारी’ कर्यौ। इणरा 13 अेपिसोड कर्या। ओ पूरौ ई हुय चुक्यौ है। सत्यजित राय अेक सीरियल है, उणमें ई काम कर रैयौ हूं, यश चौपड़ा दुनिया री चावी कहाणियां माथै अेक सीरियल बणा रैया है, उणमें पुश्किन री ‘ड्यूअेल’ में काम कर रैया हूं, जिणरौ हिन्दी में नांव दियौ गयौ ‘गोली’। अमान अल्लाना रा च्यार मुकदमा है, उणां में अेक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रैयौ हूं।
सैयद मुनव्वर अली : आज तांई आप कित्ती फिलमां कर चुक्या हौ।
ओमपुरी : आज तांई म्हैं लगै-टगै 50 फिलमां कर चुक्यौ हूं। जिणां में ‘आक्रोश’, ‘मंडी’, ‘सद्गति’, ‘नासूर’ अर ‘सांझी’ खास-खास है।
सैयद मुनव्वर अली : आपरी भूमिकावां अन्याय री सिकार पीड़ित आत्मावां री भूमिकावां है? कांई आपनै इणी भांत री भूमिकावां रास आया करै, सुख री भूमिकावां नहीं।
ओमपुरी : म्हैं लोग चास्यां कै मनोरंजन री फिलमां ई हुवै। कांई म्हां उण हद तांई पूगग्या हां कै मनोरंजन री सोच सकां। फरज करौ—म्हां खुद रौ अेक खूणौ सुरक्षित कर लियौ। अच्छौ पइसौ ई कमाय लियौ है या संपत्ति लेली है। अर आराम सूं सुरक्षित बैठ्या हां। पण सडक माथै जकौ निजर आवै, उणनै देख’र बौत ई कोफ्त हुवै। तो कांई फायदौ हुयौ खूणौ सुरक्षित कर’र; जद तांई कै आप अच्छै मन सूं उणनै सुरक्षित नीं कर सक्या। अर आपनै कोई ग्लानि ई नीं हुयी।
मनोरंजन जिनगाणी रौ अच्छौ हिस्सौ है, पण तद, जद आपां रै समाज बुनियादी चीजां पूरी कर ली हुवै। इणी वास्तै घणकरी फिलमां रै बारै में कैयौ जावै कै अे फिलमां गरीबी दिखावै अर विदेसां में आपां री छिब बिगाड़ै, आपां री नाक कट जावै। पण गरीबी है तो क्यूं नीं दिखावां?
सैयद मुनव्वर अली : रंगमंच रो आपरौ अनुभव सिनिमै में किण तरियां काम आयौ। दोनां में कांई फरक लागै?
ओमपुरी : भावना में कोई फरक नीं है, चायै थियेटर करौ अर चायै सिनिमौ करौ। कोई ई माध्यम आप चुणौ, भावनावां समान हुवै, इण वास्तै म्हनै थियेटर अर सिनिमा में कोई फरक निजर नीं आवै। फरक फगत इत्तौ है कै फिलम घणा लोगां तांई पूगै।
तकनीक रै स्तर माथै ई कीं फरक है। कीं चीजां थियेटर में नीं है। जियां कै कैमरामैन नीं हुवै, अेडिटर नीं हुवै। थियेटर में म्हैं लोग दरसकां रै सामी ‘परोक्ष’ रूप में जावां अर सिनिमा में ‘अपरोक्ष’ रूप में।
सैयद मुनव्वर अली : राजस्थान रै बारै में आपरा कांई विचार है।
ओमपुरी : (वे बौत ई आत्मीयता सूं कैवण लागा) राजस्थान रौ गांवठी परिवेश म्हारै दिल नै घणौ लुभायौ है। अर लारलै दिनां दो म्हीनां तांई जगचावा फिलमकार मृणाल सेन री फिलम ‘जेनेसिस’ रै वास्तै जैसलमेर ठैर्यौ तो म्हनै लागौ कै म्हैं राजस्थान में ई बस जावूं। वाकेई राजस्थान री अथाग सांस्कृतिक अर इतियासिक संपदा री संसार में कोई शानी नीं। अर म्हैं देख्यौ कै विदेसी पर्यटकां में राजस्थान रै प्रति अनोखौ ‘क्रेज’ है। म्हनै तो अफसोस है कै ‘दूरदर्शन’ अर फिलम वाळा सही मूल्यांकन नीं कर्यौ।