‘राजस्थांन रौ समाज गुलदस्तै वाळी सी अेकता’
तेजसिंघ जोधा : म्हैं राजस्थान नै बीच-बिचाळै राख’र दो-च्यारेक मुद्दां माथै आप सूं बात करस्यूं। पैला-पैल तौ राजस्थान रौ समाज। कांईं उणरौ कोई संपूरण सरूप बणै? कांईं आपां उणनै किणी कम्पलीटनेस में पिछांण सकां?
छगन मोहता : राजस्थानी समाज जिसी टर्म, म्हनै तौ लागै आपां थोपां। राजस्थानी समाज नांव री कोई चीज कोनी। औ अबार राजनीतिक परिवरतन होयौ, आजादी आई, इयै रै बाद ई तौ औ राजस्थांन सूबौ या प्रांत बणियौ। बैं सूं पैला राजस्थान अलग-अलग रियासतां में विभाजित थौ।
समाज जित्ता भी है, राजस्थान में है या और कठैई है, लेकिन खासतौर सूं राजस्थान में जिका है, वै या तौ जाति रै आधार पर है, या धरम-संप्रदाय रै आधार पर। खासकर जाति रै आधार पर। जींयां बीकानेर में ईं महेस्वरी समाज अर ओसवाळ समाज है। केई बातां रौ साम्य है। जींयां के दोनूं बांणिया है, बौपार करणिया है। पण बैं रै बाद वांरा रीति-रिवाज, प्रथावां, जिका कै संस्क्रती रा अंग मांन्या जावै, वां में थोड़ौ साम्य भी है, तौ विसेस फरक भी पायौ जावै।
तौ अेक भूगोळ री अेकता तौ मांन लेवां आपां, के होगी, अर सासन री अेकता भी होगी। दोय चीजां री अेकता तौ होगी। और बोली-चाली रै मांय नै भी बिलकुल अेकरूपता तौ कोनी, लेकिन बौत हद तक राजस्थान रौ आदमी अेक दूजै नै समझ सकै। पण फेर बांरी संस्क्रती जकै नै कैवां, बैंरै मांयनै फरक आवै।
तौ अेक तौ इयै रूप में अेकरूपता नै सोचां, अर अेक इण अेकरूपता नै गुलदस्तै री तरह सूं लेवां, और अेक ई भांत रा, अेक ई जात रा पुस्पां री माळा री तरह सूं नीं लेवां, तौ इयै नै कैयौ जाय सकै के यौ अेक समाज है।
लेकिन या ध्यांन में राखणौ चाहिजै के गुलदस्तै में फूल छोटा बड़ा भी होवै, रंग भी अलग होवै, गंध भी अलग होवै, अर साथै बैंरै घास अर पत्तां रौ भिळाव भी करणौ पड़ै। कोरा पुस्प ई पुस्प को होवै नीं।
तौ बैं रूप में ले सकां। क्योंकै आपस में सम्पर्क है। अेक ई जागा रा रैवण आळा है। बोली रै माध्यम सूं भी सम्पर्क है, अर दूजी बातां रौ भी आदान-प्रदान है।
तेजसिंघ जोधा : तौ इण सामाजिक अेकरूपता रै अभाव रा आपनै कांईं कारण लागै?
छगन मोहता : आपां सरू सूं ईं बिखरियोड़ा हा। राजनीतिक तरीकै सूं भी, अर आजीविका रै तरीकै सूं भी।
सामंती जुग हौ, बैंरै मांयनै, ज्यों अै जाट-बिसनोई है, अै सब किसांन कैटेगरी में रह्या। अर सासक है, वै राजपूत रह्या। और बांणिया-बौपारी है, जका आज बौत ज्यादा सम्पन्न होयगा, करोड़पति अर अरबपति तकातक होयगा, पण अठै तौ बांरौ बौत गौण स्थांन थौ। कोई खास स्थांन ई को रह्यौ नीं। अर अै जित्ता भी है, वै घणकराक बारै ई बारै गया, अर वठै सूं सम्पन्नता हासिल करी अर अठै लाया।
तौ अठै बां जकी हवेलियां बणाई, कारीगरी री चीजां बणाई, मंदिर बणाया, जकै सूं कलावां रौ प्रोत्साहन होयौ, अर जिण सूं थोड़ा दूजा धंधा करण वाळां रै मांय नै भी सम्पन्नता आई, तौ आ सब तौ बारली कमाई पर आई। राजस्थांन री तौ आ कमाई कोनी थी। राजस्थान रै बांणियै री आ विसेसता रह्यी है के बौ किफायतदार रह्यौ। दूर यात्रावां रौ, अर साहस रौ गुण रह्यौ बैं रै मांयनै। बै पईसै नै लाया अठै। अर लावणै रै बाद बांनै लागौ के म्हे सुरक्सित हां अठै। रियासतां रै मांय म्हे सुरक्सित हां, म्हांरौ पईसौ सुरक्सित है। इयै रै वास्तै बै अठै आपरा हैडक्वाटर बणाया। बैं पईसै नै संचित अर सुरक्सित राखणै रा। अर बठै बै कांम चलाऊ इन्वेस्टमेंट रै रूप में दरसावता रह्या। तौ बैं रूप में बौत ज्यादा अठै रौ रैण-सैग, अठै री संस्क्रती-कला-कारीगरी वगैरा, बां रै द्वारा पोसित हुई। और सामंती राजावां रै द्वारा रक्सित हुई। क्योंके बांरै भी इंट्रेस्ट में थी या।
ज्यों अठै बीकानेर रियासत री अस्पताळ, स्कूलां वगैरा, जे सरकारी भी है, तौ बांरै मांयनै बांणियै रौ बौत बड़ौ योगदांन रह्यौ। बौत आसांनी सूं लाखां रिपियां रौ चंदौ हो जाया करतौ।
अर राजस्थान रा राजा जका हा, बै विलासी भी रह्योड़ा है, जकी गौरव-परम्परा थी, बा तौ ब्रिटिस हकूमत रै बाद ई खतम होयगी। जुद्ध री अर पराक्रम री तौ बै गाथावा रैयगी। अर बां गाथावां रै रूप में राजस्थान बौत ई ज्यादा प्रचलित होयौ। बां गाथावां री प्रसस्ति तौ डी. अेल. राय जिस्या लोगां आपरा नाटक लिख’र वांरै मांय कीधी। पण बीच में सिवाय इणरै के अंगरेजी राज नै जद-कद ई महाजुद्ध होवै, तौ फौजां सप्लाई कर देवै, या कठैई बगावत होवै, तौ सैनिक भेज देवै। आंरै अलावा तो आं राजावां रौ कोई बडौ योगदान रह्यौ कोयनी। अर सासन रै मांय आ राजावां अंगरेजी सासन री नकल कीधी। सासन करबा रै वास्तै अै सरू सूं ई वठै सूं आदमी मंगाया। सारै ई राजस्थांन में।
जैपर री आ ई हालत ही। जोधपुर री आ ई हालत ही। जोधपुर में तौ आखरी बगत ताईं अंगरेजा री हकूमत ई रह्यी। बीकानेर में इत्ती को रह्यी नीं, पण पैर्टन नमूनौ सासन रौ सगळै बौ ई हौ।
पण राजस्थांन रै समाज रौ जकौ बौत बडौ भाग हौ गांवां में किसानां रौ, अर बैं रै अलावा जका नीची जात वाळा हा, जका के हमेसां उपेक्सित अर पीड़ित रह्या। अै न्यारी-न्यारी जातियां रा लोग आप-आपरी जातियां रै आधार माथै छोटा-छोटा सांस्क्रतिक पैटर्न बणाय लिया। डवलप कर लिया। अब आंरी विभिन्नता जकी है, वा बौत है। जींयां जाटां री संस्क्रती है, वा केई सूं को मिळै नीं। बाणियै सूं को मिळै नीं, बांमण सूं को मिळै नीं, छत्री सूं को मिळै नीं, लेकिन है तौ राजस्थांन रा।
तेजसिंघ जोधा : यूं तौ राजस्थान रा न्यारा-न्यारा जिलां रा जाटां नै देखा तौ वां में ई फरक लाधै, पण राजस्थान रा जाटां नै जे हरियांणा, पंजाब के उत्तरप्रदेस रा जाटां सूं मिळावां, तौ वै बिलकुल ई कोनी मिळै, इण स्थिति नै आप किंयां देखस्यौ?
छगन मोहता : इयै वास्तै के जाट अठै लिंक री तरह रह्योड़ा है, कड़ी री तरह। अेक तरफ तौ राजपूत सूं सीधौ सम्बन्ध रह्यौ। बै सासक हा, अर अै सामित रह्या। लेकिन अेक सीधौ सम्बन्ध रह्यौ। जागीरी गांवा में भी, अर गैरजागीरी गांवां में भी। हालांकि राजपूतां रै प्रति बैं रै जीव में अेक बड़ी घिरणा अर अेक आक्रोस रह्यौ। (बींया राजपूतां रै रहन-सहन नै अर वांरै तौर-तरीकै नै जाटा अपणावण री चेस्टा भी कीधी।) पण राजपूतां री भासा रै मांय नै अर जाटां री घरेलू भासा रै मांय फरक है। बीकानेर में भी फरक है अर जोधपुर रै मांय नै भी फरक है। दूसरौ, जाट आपरी फसल-उपज रै वास्तै बांणियै रै सम्पर्क में भी रह्यौ, सहरी बांणियै रै। तौ वौ अेक लिंक री तरह सूं रह्यौ, राजपूत अर बांणियै रै बीच में। तौ आ परिस्थिति बठै हरियाणा वगैरा में इत्ती को रह्यी नीं। तौ अै परिस्थिति रै कारण सूं बै में संस्कार-भेद, व्यवहार-भेद अर रहण-सहण रै तरीकै में भी फरक है। जोधपुर में जाटां नै अैनकरेज किया गया थोड़ा। अर बै अैनकरेज किया गया था ईडर म्हाराजा प्रतापसिंघजी रै बगत सूं ईं। वां देख्यौ यांनै हमेसां नाराज कीयां को पोसावै नीं। बौत बडी संख्या है यांरी। सम्पन्नता भी है। अर बठै जोधपुर में राजपूतां नै बैलैंस करणौ भी जरूरी थौ। पण बीकानेर रै गंगासिंघजी रै तरीकै में जोधपुर सूं फरक थौ। गंगासिंघजी आपरी कुसळता सूं जाट अर राजपूत दोन्यां नै दमित भी राख्या, अर बैलेंस करण में राजपूतां नै थोड़ौ प्रोत्साहन देय दियौ। प्रिफरेंस देय दियौ। जिकै रौ जाटा में अठै आखरी वक्त तक क्षोभ रह्यौ। अेक चौधरी हरीचंद री किताब लिखियोड़ी है, आपरी जीवनी। बैं रै मांय नै भौत ई बुरी तरह औ आक्रोस अर क्षोभ व्यक्त हुयौ है। बीकानेर रै इलाकै में जाट बांणियां रै प्रभाव में ज्यादा रह्या। जोधपुर में आं नै अैनकरेजमेंट मिळियौ जणा अै राजपूती ढंग रा ई साफा पैरणा, जोधपुरी ढंग रा ई बिरजस पैरणा वगैरा सरू करिया। ज्यों जोधपुर-नागौर रा अै जित्ता जाट है, मिरधा परिवार वगैरै अै सब, ई वास्तै के बळदेवराम जी मिरधा जोधपुर रियासत रा बौत बडा, ऊंचै सूं ऊंचा पुलिस रा अधिकारी हुया है। और बांरी बौत प्रतिसठा रह्यी। तौ अै नंबर दो जागिरदार कैटेगरी में आवण लागग्या बठै। जिका बीकानेर में को आया नीं, हालांकि बीकानेर में बौ जाटां रौ अेक वंस है गोदारा, जिकौ बीकानेर री स्थापना रै बगत सूं ईं राजतिलक करणवाळी जातियां में सूं गिणी जावती। लेकिन अठै रौ हमेसां रौ सासन औ ई रह्यौ है के आंनै दबाव’र राख्या जाय। तौ इण किसम रा छोटा-मोटा फरक तौ स्थानीय भेद रै कारण है।
तेजसिंघ जोधा : कारण तौ काईं ठा कांईं-कांईं रह्या होसी, अर कैड़ी अैतिहासिक परिस्थितियां में सूं आपांरौ समाज निकळियौ होसी, पण आपांरै समाज री जातियां आपरी न्यारी-न्यारी आइडेंटिटी में भी ढळियोड़ी लागै, अर वां में आपसरी में भी अेक तालमेल अर सद्भाव दीखै। इणसूं लागै के समाज इतरौ बिखरियोड़ौ तौ नीं हौ, उणरौ अेक सैट रूप तौ हौ ई?
छगन मोहता : बिखिरियोड़ौ तौ इण वास्तै नीं हौ के राजा जोड़णै वाळौ फैक्टर थौ। अर राजावां रौ करीब-करीब अेक ई पैटर्न रह्यौ है राजस्थांन में। सिवाय भरतपुर नै छोड’र, जठै के जाट राजा हौ। बाकी राजा तौ चायै बीका होवौ, चायै भाटी, अै सब तौ अेक ई किसम रा हा। अर समाज सूं यांरी रिलेसनसिप रौ पैटर्न भी अेक ई थौ। राजा अर समाज रै नीचै सूं नीचै आदमी रै बीच में अेक सोपान कम रौ संबंध थौ।
अेक तौ राजा। अर पछै बांरै नीचै जागीरदार। पैला तौ बांरी आपरी जात रा योद्धा जागीरदार, जकां नै रियासतां री सीमावां माथै जमीन देय’र बसाया जावता। अर बैं जमांनै में बै ई फौजां रौ कांम करता। अलग फौज राखवा री राजा नै जरूत कोनी पड़ती। आंरै अलावा जित्ता भी धंधा करण वाळा था, वां में सूं अेक-अेक परिवार श्रेष्ठ मांन’र राजा सूं जोड़ दियौ जावतौ। जागीरदार कैटेगरी में ईं। आंरी दरबार मे सीटां लाग्या करती। बांमण, दरजी, सुथार, नाई सब ई जातियां में सूं। अब आंरै नीचै जात-पचायतां होवती, अर बां पंचायतां सूं जुड़ियोड़ौ होवतौ बौ परिवार। तौ नीचै रै दुख-दरद नै ऊपर तांईं पौंचावण रौ अेक चैनल थौ। औ ईंयां समानता रै आधार पर को थौ नीं। ऊपर-नीचै रै आधार पर, सुपरियरटी रै आधार पर थौ। अब इण में हैरिडिटी चाली, वंस-परम्परा। अर वंस-परम्परा रिपीटेटिव होवै। तौ वा अेक यूनीफोरमिटी तौ पैदा करै ई है नीं। आ यूनीफोरमिटी बठै को रह्यी नीं, जठै ब्रिटिस हकूमत ही।
तेजसिंघ जोधा : तौ कांईं इण यूनीफोरमिटी सूं अब राजस्थानी समाज रै अेक होबा री कोई उम्मीद कोनी बणै?
छगन मोहता : अब कोनी। बिलकुल ई कोनी। बा जमीन ई खतम होयगी। राजस्थानी समाज रौ औ जकौ राजस्थानी सबद है, ईं रौ मतलब ई है राजा रै ऊपर आश्रित समाज। तौ बौ खतम होयग्यौ। अर राजा रौ मतलब हौ वंस-परम्परागत राजा। तौ जकौ समाज हौ वौ भी वंस-परम्परागत समाज। अब तौ वा सारी चीज ई बदळगी। अब तौ बिखराव है। जोड़बा वाळी कोई चीज कोनी।
तेजसिंघ जोधा : राजस्थान में हिंदी री भूमिका नै आप कीकर देखौ?
छगन मोहता : धाय मां री तरह सूं। पण मां मर जाय, जद लाचारी है, धाय मां सूं ईं कांम चलावणौ पड़ै।
तेजसिंघ जोधा : राजस्थानी भासा अर समाज री अेकरूपता रै वास्तै अब आप किंया सोचौ?
छगन मोहता : कांईं सोचां! अब कैं सूं ‘द्वेष’ करां। अर ‘राग’ कर को सकां नीं। सेल्फ इंट्रेस्ट इत्ता बिखर गया, डिवाइड हूयग्या के ‘राग’ होय को सकै नीं। ‘स्वराग’ हमेसां ‘परद्वेष’ सूं ई होसी। रास्ट्रीयता भारत में पनपणै रौ कारण औ ई हौ के अंगरेजां रै प्रति द्वेष री भावना। नीं तौ रास्ट्रीयता जोड़णै वाळौ फेक्टर ई को बणतौ नीं। इण वास्तै भलांई भासा री अेकरूपता होवौ या भलांईं समाज री, इण ‘स्वराज’ अर ‘परद्वेष’ रै सिद्धांत अर परिस्थिति नै ध्यांन में राखणी पड़सी।