राधाकिशन चांदवाणी : सबसूं पैला ‘माणक’ रै पाठकां नै आपरौ कीं परिचय दिरावौ?

 

हरीश भादाणी : म्हारौ जनम बीकानेर में ब्राह्मण (भादाणी) परिवार में होयौ। अर म्हारी शिक्षा ई बीकानेर में हुई। सरूपोत री शिक्षा पूरी नीं कर सक्यौ। इणरौ कारण म्हारी घरू परिस्थितियां ई समझौ। आपां रौ समाज विचारां सूं तो घणौ सम्पन्न है, पण है रूढिवादी। म्हारा विचार बचपन सूं ईं कीं क्रांन्तिकारी रह्या। म्हारै जनम रै थोड़ा दिनां पछै ई पिताश्री देवलोक होग्या। म्हारौ पालण-पोषण श्री भातमालजी जोसी करियौ, जका के खुद मानीता कवि हा।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आपरौ काव्य-जगत सूं जुड़ाव कद अर किंयां होयौ?

 

हरीश भादाणी : कविता अर विरोध रा संस्कार म्हनै भातमालजी जोसी सूं मिळ्या। लिखणौ म्हैं सन् 55 में सरू कियौ। जद म्हैं लिखणौ सरु कियौ, तद हिन्दी में ई सरु कियौ, पण केई कवितावां राजस्थानी में ई लिखी। वां दिनां विचारां सूं म्हैं राजस्थानी रौ परम विरोधी हौ।

 

राधाकिशन चांदवाणी :  पण आपरी तो राजस्थानी भासा में लिख्योड़ी केई कवितावां घणी चावी हुई?

 

हरीश भादाणी : हां, चुणावां अर प्रौढ शिक्षा रै कारण म्हनै गावां में घूमण रौ घणौ अवसर मिळियौ। म्हैं गांवां में भाषा, खासकर राजस्थानी री समृद्धि देखी, तो म्हैं राजस्थानी भाषा रौ पूरी तरियां पक्षधर बणग्यौ। म्हनै इण बात रौ गुमेज है के म्हैं म्हारी गलती सुधार लीनी। आज म्हैं हिन्दी अर राजस्थानी दोनां में ई लिखूं।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आपनै राजस्थानी में लिख्योड़ी सरू पोत री कोई कविता याद है कांई?

 

हरीश भादाणी : म्हैं राजस्थानी में लिख्योड़ी सरूपोत री कविता री सरूआत इण भांत करी ही—

''थारै लांबा जोडूं हाथ ऊनाळा
थड़ी-थड़ी कर ऊभ 
पगलिया ले ले रे!''

 

इण गीत में ऊनाळै नै अेक टाबर-रूप में देखतां-देखतां बेगौ-बेगौ बडौ होय’र बिदा करण री बात कही है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आप लिखणै री सरूआत किण भांत री कविता सूं कीनी?

 

हरीश भादाणी : जिण बगत म्हैं लिखणौ सरू कियौ, उण वगत नव-स्वच्छन्दतावाद री हवा चाल रह्यी ही। इण वास्तै म्हारै काव्य री सरूआत आप गीतां सूं ईं समझौ। क्यूं के सरू सूं ई म्हारौ जुड़ाव विरोधी-पक्ष सूं रह्यौ अर कविता रै माध्यम सूं सामाजिक सरोकार बढावण रा संस्कार म्हनै मिळिया तो सामाजिक यथार्थ ई म्हारी कविता में रह्यौ अर आज ई है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : उण बगत नुंवी कविता ई लिखीज रह्यी ही, उणरै बाबत आपरा कांईं विचार है?

 

हरीश भादाणी : इण संदर्भ में अेक बात साफ कर दूं के नुंवी कविता रै प्रभाव में घणकरा कवि लेखक हा। कवि छन्द-मुक्त रचनावां लिख रह्या हा। छंद छोडण रौ प्रभाव म्हारै माथै तो कोनी पड़ियौ। लगभग तीस बरसां सूं रचनाक्रम सूं जुड़्योड़ौ हूं, आज ई इणबात नै म्हारै पूरै वजन रै साथै कैवणौ चावूं के जे कविता रै माध्यम सूं समाजू सरोकार बढावणौ है अर समाज री चेतना री बढोतरी में कविता नै जद आपरी हिस्सैदारी निभावणी है तो आज रै संदर्भ में नवा-पुराणा छंद अपणावणा ई पड़सी। कविता में राग अर छंद मोटी बात है। गांव अर शहर रौ आम आदमी जिणणै आपां फटकारै सूं अणपढ़ कह दां, बौ ई आदमी कदै बालमीकि, कदै गीता तो कदै तुळसी-कबीर रै समाजू यथार्थ नै आपांरै सामी उघाड़ देवै। इस संदर्भ में हूं कविता में छंद अर राग री घणी जरूरत मानूं।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आपरी केई राजस्थानी अर हिन्दी री कवितावां में रेगिस्तान रा सुन्दर चित्राम सामी आया है, इण बाबत आप कीं बतावौ?

 

हरीश भादाणी :  यूं तो म्हैं आथूणै राजस्थान रै वातावरण में पळ्यौ अर बडौ होयौ। पण सन् 75 सूं गांवां सूं जुड़ाव रह्यौ। संस्कृति री मूळ जड़ां नै पिछाणबा री जरूरत ऋषि तुल्य डॉ. छगन मोहता सूं मिळी, तो राजस्थानी रचनावां में ईं नीं म्हारी हिन्दी रचनावां में ईं राजस्थानी भासा अर संस्कृति रौ प्रभाव बढ़तौ गयौ। भासा रा अै प्रभाव आप ‘खुले अलाव, 'पकाई घाटी’ रै गीतां में अर ‘सन्नाटे के शिलाखण्ड पर’ अर ‘एक अकेला सूरज खेले’ री कविता-पोथियां में देख सकौ। राजस्थानी कविता-संग्रह ‘बाथां में भूगोल’ अर ‘सृजणहारा हुणिया’ अर राजस्थानी री दूजी केई रचनावां में ई हूं म्हारै परिवेश सूं जुड़ाव रौ जतन कियौ है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आपरी प्रकाशित पोथ्यां?

 

हरीश भादाणी : राजस्थानी में 5-6 है। हिन्दी में 12 कविता संग्रह आय चूका। प्रौढ़ शिक्षा सूं सम्बन्धित केई पोथियां ई राजस्थानी में है, आं में नाटक, कविता अर दूहा इत्याद है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : म्हैं सुणी है के आप ‘फ्री-लान्सिंग’ ई करता रह्या हौ?

 

हरीश भादाणी : हां, म्हैं ‘फ्री-लॉन्सिंग’ में फिलमी गीत लिख्या अर केई पोथियां रौ संपादन ई कियौ। बम्बई सूं प्रकाशित ‘आदिम से आदमी तक’ कहाणी-संग्रह अर ‘आदमी री जात्रा’ नांव सूं कविता-संग्रह रौ सम्पादन कियौ। कलकत्ता सूं अंग्रेजी कहाणियां रौ हिन्दी-अनुवाद कार्य करतौ रह्यौ। क्यूं के 13 बरसां रै लगोलग प्रकासण रै बाद ‘वातायन’ बंद करणौ पड़्यौ। बैं रै बाद आज तांईं आकाशी वृत्ति ई म्हारी आजीविका रह्यी। इण तरियां कड़वा अर मीठा अनुभव तो मोकळा होया, पण इण पेटै म्हारै प्रदेश रा हिन्दी अर राजस्थानी लेखक-परिवार जितौ म्हनै हेत अर अपणापौ दियौ बैं री तुलना सारू म्हारै कनै सबद कोनी।

 

राधाकिशन चांदवाणी : राजस्थानी रै प्रकासण अर प्रसारण रै समबन्ध में आपरा विचार?

 

हरीश भादाणी : आज राजस्थानी गद्य अर पद्य में जितौ की लिख्यौ जाय रह्यौ है, वौ किणी दूजी भासा री तुलना में छोटौ अर ओछौ कोनी। आ बात जरूर है के आपणै प्रदेश में राजस्थानी रै प्रकासण अर प्रसारण रा अवसर बौत ई थोड़ा है। पत्र-पत्रिकावां री आज ई कमी है। ‘माणक’ सूं लोगां नै राजस्थानी पढणै री आदत बणी है, औ श्रेय ‘माणक’ नै जावै। पण ई दिसा में तो औरूं मोटै जतना री जरूरत है।

 

राधाकिशन चांदवाणी : इण सूं जुड़ियोड़ौ अेक सवाल मायड़ भासा राजस्थानी री मानता रौ ई है, इण बाबत आपरौ कांईं कहणौ है?

 

हरीश भादाणी : हूं आ महसूस करूं के हिन्दी अर राजस्थानी लिखणै रै इणी क्रम में म्हनै राजस्थानी भाषा री मानता अर बढोतरी सारू जठै-जठै ई जतन होय रह्या है, बां जतना सूं जुड़णौ चाहिजै। म्हनै इण बात रौ घणौ दुख है के जिण भाषा रौ सबदकोस अंग्रेजी भाषा रै सबदकोस सूं ई बडौ है। अेक-अेक सबद रा 20-20 सबद मिळै, बीं भाषा नै मानता कोनी। बीं भाषा में सरूआती पढ़ाई री व्यवस्था कोनी। म्हारी समझ में तो सगळा लिखारां नै अेकजुट हो’र राज अर केन्द्र सरकारां माथै दबाव डाळणौ चाहिजै। हूं तो कैवूं के राजस्थानी री मानता खातर जे आन्दोलण ई करणौ पड़ै तो करणौ चाहिजै।

 

राधाकिशन चांदवाणी : भादाणी जी, इण बरस आपनै राजस्थान साहित्य अकादमी रौ सर्वोच्च सम्मान ‘मीरां पुरस्कार’ मिळियौ, इण सूं आपनै कांईं लखायौ?

 

हरीश भादाणी : हूं तो आ समझूं के जिकी रचना-धरोहर रै नांव सूं औ पुरस्कार दियौ जावै, उण सूं रचनाकार रौ दायित्व बढ जावै। इण रूप में रचनाकार रचना री परम्परा रै अंशी-रूप में आपरी रचना-यात्रा जारी राखतौ रैवै।

 

राधाकिशन चांदवाणी :  इण पुरस्कार सूं पैलां ई कोई पुरस्कार आपनै मिळियौ?

 

हरीश भादाणी :  हां, राजस्थान साहित्य अकादमी सूं दो वार सन् 1967 अर 1984 में सुधेन्द्र पुरस्कार ई मिळियौ।

 

राधाकिशन चांदवाणी : आपरी इसी कोई कविता जिणमें जीवण लक्ष्य रौ वर्णन होयौ होवै?

 

हरीश भादाणी : राजस्थानी कविता रौ संग्रह ‘बाथां में भूगोल’ है। ई नांव री समाजू यथार्थ अर थार रै जीवट नै आखै मानखै रौ जीवट बणायौ है। हूं सोचूं रचना रै ईं रूप रौ निर्वाह म्हारै सूं होवतौ रह्यौ है। इण री दो-तीन पंक्तियां म्हनै याद आवै—

म्हैं भर्‌यौ है बाथां में भूगोल
म्हारी कमजियां रै माथै
म्हारौ इधकार कोनी
सगळां री हांती-पांती बरीबर रैसी...

अेक दूहौ है—

पाणी झुर-झुर सूखग्या, रेत कंवर रा नैन
देख्या सूना डैर, ऊग्या कोकरु हूणियां

 

राधाकिशन चांदवाणी : नुवां लेखकां वास्तै कोई संदेस?

 

हरीश भादाणी : संदेस तो नीं, हूं बौत विनय भाव सूं आ कैवणी चावूं के जे सारा लेखक राजस्थानी भाषा अर साहित्य री बढ़ोतरी रौ संकळप लेवै तो स्वभावज रूप सूं हिन्दी नै बळ मिलसी। अठै हूं म्हारी पैलड़ी बात भळै दोहरावणी चावूं के छंद अर राग कविता री व्यापकता देखता थकां घणी जरूरी है। आं माथै बळ दिरीजणौ चाहिजै।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : हरीश भादाणी सूं राधाकिशन चांदवाणी री बंतळ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : फरवरी 1987
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