थारी म्हारी का भूंजा क्यूं लादणा
आपण छां दो तीन दना का फावणा
क्यूं सूना की झार्यां, बत्तीसा भोजण
भरद्यै छै जद पेट फकत मूठी चणा
कस्यां जीव को सुवटो छोडै अमरायां
पांव बंध्या आगै पाछै का दावणा
चौड़ै हेत बधावै घर में घर खावै
आछ्या उघड़्या रै माणस का माजणा
अब तो असल रंग को चोळो तन धारा
घणा फुलाया रंग-रंगीला फुलकणा
छोडां भरमाती बादळ बणज्यारा की
ठगणी माया की उलटी गणती गणां।