मिलै नीं अठै सुखड़ो राम

कैवां किण नै दुखड़ो राम

काळ कोटड़ी जीवण बणियो

नईं धूप रो टुकड़ो राम

बाट्यां दाई सिक रैया सगळा

जीवण है कै जगरो राम।

नाग-नेवळा खेलै सागै

सता रो फेगड़ो राम।

बुणै खुद खुद उळझै

मिनख तो मकड़ो राम

चांदी री सड़कां पे भाजै

मिनख हिड़कियो चकरो राम।

मिनख देह लै आभै पोंच्यो

संवट गयो पण मनड़ो राम।

सोन ताकड़ी देस नै तोलै

लूण हरामी तगड़ो राम।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : लक्ष्मीनारायण रंगा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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