मिनख तो दीखै कठै अब, भीड़ बधती जा रैयी है

मान-मरजादा कठै अब, पीड़ बधती जा रैयी है

भोळा-ढाळा वोटरां सूं वोट ठगता रैवै

ठगोरां री ठगी हद पार करती जा रैयी है

दूध खोटो, दाळ खोटी, रिस्वतां री राळ मोटी

न्यायवाळी भावना री रेट घटती जा रैयी है

मानखो मांदो पड़्यो इण लोकराज में

दवायां सारूं डागदरां री फौज बधती जा रैयी है

भूत बंगला, भव्य कोठ्यां, निज रौ बैंक बैलेंस

मारूति कार्‌यां री कतार बधती जा रैयी है।

खेत नै जद बाड़ खावै, कुण सो करौ उपाय

लूट रखवाळा करै जद, छूट बधती जा रैयी है

राम तो औतार बणनै रावणै नै मारता

पण रावणां री फसल ओजूं खूब बधती जा रैयी है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिवराज छंगाणी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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