खरी-खरी कैवणिया खूटा

साचां रा मन पग-पग टूटा

घण अकाळ धोक्यो नित इन्दर

पण ना मेहड़ला धर बूठा

देव देवियों अफसर चरणों

लाख लुळ्यो पण बो ना तूठा

म्हैं तो कोई चूक करी ना

पण नी जाणै क्यों वै रूठा

वै तो सदा कैवै सो साची

कूण कैवै मुख वै है जूठा

खरी-खरी कैवणिया खूटा

साचां रा मन पग-पग टूटा।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : दीनदयाल ओझा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-31
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