जेता काळा बादळ जेतौ गोरौ जळ

च्यारूं आडी उतना ही भोळा-भोळा छळ

खा लेबौ घणौ कठण नाव कै बना

सुख छै जश्यान कोई संघाड़ा कौ फळ

खाती-पीती बेरां पाटी बांध्यां बैठ्या लोग

खायां जासी नीर्‌यां जाऔ थां भलांई खळ

होटां पै सूं उडगी सोरम सरमा’र

माथा पै उघड़ आया तीन-तीन सळ

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : प्रेमजी प्रेम ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अगस्त 1986
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