कीच बीच में गऊ तिसायी झांक बिणजारा,
भूखां डुलगी बाळद सुल्यां हांक बिणजारा।
दरवाजै पर सुबकूं पहरादार ठुळी मारै,
मोखी में सूं ईं तू अब तो झांक बिणजारा।
आंसू पूंछण नैं स्याणा, कुण कुण नैं दूं हिमळास,
डळ बळियां भर्योड़ी है हर आंख बिणजारा।
मनैं बाजरी रो तोड़ो सुण बो हंसकर कैवै,
अब कै जिता चुणाव, सपट खा दाख बिणजारा।
पचां रात दिन म्हे, बो बिना पच्यां लाखां जोड़ै,
अठै हाथ में धण कै बी नां लाख बिणजारा।
लंगवाडा री तार, लफंगा रै माथै झंडो,
भला मिनख री उड़ती अठै मजाक बिणजारा।
नीं कोई मुरजाद, कायदो, काण सरम नीं आब,
तुळसी तज बस्ती पूजै अब आक बिणजारा।
भाषण री जिमणार घणी, पण कियां भूख भागै,
थोथा बिस्वासां सूं कटसी नाक बिणजारा।
भूकां मरै कुम्हार, पूणता रा नखरा देखो,
मोत्यां भर्यो तोबरो करै उबाक बिणजारा।
बादळ बैरी, काळ हंसै, अर मौत भूलगी नाम,
जीणों मुसकल भूल्या आक-बाक बिणजारा।
मरां पचां दिन रात, भरण नैं बोरा री झोळी,
बो काढ़ै है बैठ्यो दोनूं साख बिणजारा।
धींगा मस्ती, धमा चौकड़ी, लाठी जीं की भैंस,
‘रसिक’ घणी अै सिर में घाली राख बिणजारा।