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हरफूलसिंह ‘रसिक’
jaipur
चावा कवि-लेखक
सम्पूर्ण
गीत
1
ग़ज़ल
4
हरफूलसिंह ‘रसिक’ री ग़ज़ल
भौत निभी, अब भी निभरी
कुण जाणैं आ कसी भाळ है
मुळकै मत मनड़ो भुळ जासी
बिणजारा