जे अतना दन भी थोड़ा छै

तो कतना दन का फोड़ा छै

डील पराया खुद की चांचां

केई मनखड़ा कठफोड़ा छै

मण भर दुखड़ा, सुख रत्ती भर

क्यूं अणमेळ्या ये जोड़ा छै

टूट्या रथ का सूरज छा म्हां

थाक्या-थाक्या सब फोड़ा छै

मनड़ा सूं सब हार्‌या-मार्‌या

पण बचनां सूं बाध्योड़ा छै

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : प्रेमजी प्रेम ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अगस्त 1986
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