धिंगाणै धणियाप, झूठी धाक क्यूं करै।
जहर, इमरत में घुळै, इसी बात क्यूं करै॥
सोरो संसार, राम गृहस्थ में रमै।
खार, बैर बांधणै रो, बवाळ क्यूं करै॥
देस-प्रेम, फिकर-जिकर, मन में बसै।
देस नै बांटण री, तूं झिकाळ क्यूं करै॥
मांग्या आवै माल, ज्यांरै कांई कमी लाल।
बै मेहनत-मजूरी, हीड़ो-काम क्यूं करै॥
‘श्याम’ थांरी लीला नै तूं ही जाणै।
नहीं बस री जो बात, तो विचार क्यूं करै॥