कांई हुयौ कैड़ी नज़र देख रैयौ हूं

दुनियां में च्यारूं मेर कहर देखर्‌यौ हूं

आज मेरै देस में यौ कांई होर्‌यौ है

जंगल सैं भी बदतर मैं सहर देखर्‌यौ हूं

सहमेड़ौ सौ आज क्यूं है समदरियौ सारौ

मैं बदळी सी सारी लहर देखर्‌यौ हूं

दुवावां सैं जिणरी बदलतौ यौ मौसम

बां नै ही क्यूं बेअसर देखर्‌यौ हूं

जठै चैन री बंसरी बाजै दिन-रात

बड़ी आस्था सूं बो घर देखर्‌यौ हूं

बुलंदी नै छूता जिका आसमां री

बै महलां रा उजड़्या खंडहर देखर्‌यौ

फूलां में दम है, कळियां में रौनक

बगीचां री रोती नज़र देखर्‌यौ हूं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मधुकर गौड़ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-31
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