जुग बदळ्यो जुग-पुरख बदळग्या।
जुग रा जीवणगीत बदळग्या।
अरथ बदळग्या धरम-करम रा।
मन-वीणा संगीत बदळग्या॥
मिनख-मिनख नै कठै पिछाणै
आस-पड़ौस हेत नीं जाणै।
सगळां री आंख्यां रै चसमो।
सै का सै इक ढाळै ढळग्या॥
इंटरनेट हुई जिंदगाणी।
असल बात है चुग्गो-पाणी।
स्वारथ री दै पून लैरका।
रिसता बरफ गर्दै ज्यूं गळग्या॥
धरती रौ अंतस कुरळावै
समदर हियो उफणतो जावै।
आभै धुंवो पीड़ रो पसर्यो।
कुण करमां रा लेख उथळग्या॥
मिनखा रै मूंडै रो पाणी।
जोधां री बा भरी जवानी।
लाज लुगायां रै तन-मन री।
सोधण में पण छाला पड़ग्या॥