इस्यो खोलियो घड़्यो विधाता, जिको आवै काम रे!

किणनै म्हारी पीड़ दिखाणूं? मिनख रैयग्यो नाम रे!

बा तो सांस गिण-गिण घाली,

मैं नित करतो जावूं खाली,

अर बै कद रैई पाली,

जिकै काम सारू भेज्यो, दे मिनख-देवळी राम रे!

काम बिचाळै पड़्यो उडीकै, मैं बैठ्यो नाकाम रे!

कियां करूं? कांईं समझ पाऊं!

करण ढुकूं, तो करण पाऊ!

कुणसी तागत नै अजमाऊ!

सांसां तो दे दीनी, विधना भूली देणां दाम रे!

दाम बिना सैं काम पड़्या है, म्हारो निकळ्यो राम रे!

मां ऊभी आंसू ढुळकावै!

बळै काळजो, फाट्यो चावै!

डाटूं तो दुख डट नी पावै!

पल-पल छिण-छिण दगै डील पर ताता-बळता डाम रे!

लाय भावड़ाभूत भभूका मारै, बाळै चाम रे!

सांसां रो नित नास करूं हूं!

देवळ री नित ल्हास करूं हूं

नित मैं अरदास करूं हूं!

किणी भांत बो पार लंघा दे, मां नै द्‌यूं आराम रे!

सगळी सांस होयज्या सैळी; मिलै मनै सुरधाम रे!

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : नवम्बर
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