काल हवा गरम चालै थी—
आज ल्हैर ठण्डी चाली,
परकोटा खींच्या पण रुत कै आगै अेक नहीं चाली।
टीण, टापरा, छप्पर, झूंपा घबरावै थर थर कांपै,
सिंह धड़ूकै, निबळ जिनावर भागै अर दूणा हांफै,
सूझै नहीं सुरक्षा, भौंचक दीखै बागां को माळी।
धूआं ई धूणां, पण जाणै आग कठीनै लागी है?
भर्यै भादवै, जेठ जवानी, आंख्यां दूखण आगी है,
सरणाटां में डूब्या मारग बसत्यां की बसत्यां खाली।
मेघ बरसता तो संवत सा होता गांव-गांव मेळा,
अब तो काळ पड़ै ल्हासां पर होवै गीध गरुड़ भेळा,
अब बिनास दे रह्यो सिरजण नै सामैं मूंडै ई गाळी।
गीतां की रमझोळ कठै अब, मन चीत्या तूंवार कठै?
अब अळाव नै घेर नाचती वै मन की मनवार कठै?
आठूं प्हैर हिया नै रांदै, सूळां सूं लथपथ डाळी।
सपना हुया सूवटा सुख का, प्रीत पावणा रूठ गया,
ज्हैर घिरणा को जड़ के पकड़ी, सारा रिश्ता टूट गया,
रीती-रीती जिनगाणी है, पिणघट है खाली-खाली।
म्हे गुलाब बोवां, पण कांटा, दूणां निपजै फूलां सूं,
सूळ चुभ्या बचतां-बचतां भी दूणा हात बबूळां सूं,
लेख बुझाण्या, बुझण्या कोनी तकदीरां देवै गाळी।
काल हवा गरम चालै थी—
आज ल्हैर ठण्डी चाली,
परकोटा खींच्या पण रुत कै आगै अेक नहीं चाली।