काढ़ण हाथां काकजा, बाढ़ण सीस बकार।
सिर चाढ़ण ततपर सदा, महा काळ मनुहार॥
ध्रम जातां, लुटतां धरा, महळां ताप मिळेह।
सब पहलां प्राणां समप, खागां कंवळ खिळेह॥
बूंब देस सिर वाजतां, हुवां सत्रवां हाम।
उण बेळ्यां आगा बधै, सीस हथेळ्यां साम॥
जलम भौम माथै ज दिन, सत्रव ले सर सांध।
बालम! जाज्यो बे हिचक, कफन सीस रै बांध॥
होतां जिण दिन रण हळां, बालम बांछ खिलीह।
‘बीर-बधू’ ‘बिधवाथवा’, मोनूं साध मिलीह॥
खा गोळ्यां रण-खेत में, भागां चोट भरीह।
बर परखंतां बाबल्यो, कोय न चक करीह॥
चंवरी चढतां चोज कर, मोज भरी मन मांहि।
साजण नै लख सोचियो, (ओ) निबळो सहरी नांहि॥
काठी किस्त कमावणों, माठी मन में मांठ।
तन जोमरदी आयतन, गिरह-गिरह बिच गांठ॥
चिन्ता मन में चोगणी, लख चुड़लै री लाज।
पड़तां धण रो पण धणीं, राख अटल मृगराज॥
मोद अमावड़ मन हुवौ, मुकळावै मिळतांह।
पड़वै ही रण-हाक पण, संकी सांभळतांह॥
मरजाणां खेला मंड्या, ताणां मोह तजेह।
प्राणां-पुहुप समापबा, सस्त्र सनाह सनेह॥
बळता जुध-बाजां बिचै, धर ऊकळता ध्रंम।
पण टूटां नब नेह रो, रण-जूटां घण रंग॥
धरा हेत रण धावियो, समप्यो सीस, सरीर।
घणां रिमां रो घेरियो, तुपकां रै चढ़ तीर॥
सायर सुणणों नंह सरै, कायर री धण काय।
सुख भरणों न सुहाग रो, मोनूं मरणों माय॥
की जामण धोखो करै, मरण जंमाई मोख।
हुमियों देस-समाज हित, तिको घणेरो तोख॥
आहां भरणों नंह अबै, उठ करणों आरांण।
अबळा हूं सबळा बणां, पकड़ बंदूकां पांण॥